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अच्छे दिन आयेंगे, पता नहीं कब आयेंगे?

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साल 2014 से अच्छे दिन की चर्चा शुरु हुई। चुनाव में हर किसी की जुबान पर था। भारतीय जनता पार्टी अच्छे दिन लाने वाली थी। देश इसे लेकर उत्सुक था और बहुत दफा इतना उत्सुक कि वह सपने देखने लगा था।

नरेन्द्र मोदी को बहुतों ने 'मसीहा' तक कहना शुरु कर दिया था।

साल 2014 के अंत तक आते-आते आम आदमी अच्छे दिनों की तलाश करने लगा। उसने अपने रिश्तेदारों तक से पूछना शुरु कर दिया था कि अच्छे दिन कैसे होते हैं? कब आयेंगे? बगैरह-बगैरह।

मगर बेचारे को उत्तर किसी ने नहीं दिया।

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साल 2015 तक आते-आते वह निराश हो चुका था। उसके अच्छे दिन नहीं आये थे। वह जैसा था फिक्र में उससे आधा हो गया था। दूसरे उसे देखकर मजाक उड़ाने लगे थे कि भैया अच्छे दिन आ गये क्या?

फिर भी उसने अपने 'मसीहा' से आस नहीं छोड़ी थी। उसे भरोसा था कि देर है, अंधेर नहीं। उसे पता था कि जो वादा उससे 2014 में किया गया था उसे पूरा होने में समय लग रहा होगा। वह इतनी आसानी से भरोसा नहीं खत्म करना चाहता था। जब भी उसे तब पीएम हो चुके नरेन्द्र मोदी की तस्वीर दिखती या वे भाषण देते हुए दिखते तो वह उन्हें गौर से सुनता। क्या पता इस बार अच्छे दिन का कोई संकेत ही मिल जाये।

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एक दिन उसे पता चला कि अच्छे दिन वाली बात सियासी जुमला थी। उसके नीचे तो जैसे जमीन खिसक गयी। उसे ऐसा लगा जैसे जीने के लिए कुछ बाकी नहीं रह गया। उसने खुद को कोसा और मन मसोस कर बेहोश हो गया।

जब उसे होश आया तो वह ऐसी सोच वाले लोगों के बीच मौजूद था जो अच्छे दिन आयेंगे-अच्छे दिन आयेंगे बड़बड़ाते हुए घूम रहे थे।

इतने लोगों को ऐसा करते देखकर उसने सोचा कि ये कह रहे हैं तो जरुर आयेंगे अच्छे दिन।

आज भी वह खोज रहा है अच्छे दिनों को। अब उसने 2016 से आस लगायी है। लगता है इसी तरह वह पांच साल तक आस लगाता रहेगा।

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-मोहित सिंह.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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