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बुलेट ट्रेन के सपने दिखाने वाले साधारण ट्रेनों को भी नहीं संभाल पा रहे

रेलवे की हालत ऐसी है कि कमजोर ट्रैक पर बीस-बाईस की स्पीड से रेंग रहीं हैं एक्सप्रेस ट्रेनें.

सबसे बड़े सरकारी महकमे रेलवे का सबसे बुरा हाल है। चार माह में पांच बड़ी दुघर्टनाओं ने रेलवे की लचर हालत बयान कर दी है। हर दुघर्टना के बाद जांच टीम गठित कर और आतंकी घटना का संदेह व्यक्त कर बात वहीं ठहर जाती है। मृतकों और घायलों के आश्रितों को मुआवजा राशि का ऐलान हो जाता है। इस बार रेल बजट आम बजट में विलीन कर स्थिति इतनी धुंधली कर दी गयी है कि यह पता ही नहीं चल सकेगा कि सरकार इस महकमे को किस दिशा और किस रफ्तार से ले जाना चाहती है।

साधारण ट्रेनों को भी नहीं संभाल पा रहे

केन्द्र की सत्ता संभालते ही तीन वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को जापान और चीन की यात्रा के दौरान ऐसे सपने दिखाये कि देश में रातों रात रेलवे और भारतीय रेलगाड़ियों की कायापलट हो जायेगी तथा देश में बुलेट ट्रेन चलेगी। भारत के इलेक्ट्रोनिक मीडिया में उस दौरान कई दिनों तक छोटे पर्दे पर जापान और चीन की बुलेट ट्रेनों को ऐसे दौड़ते दिखाया जैसे वे भारत में दौड़ने वाली हों। कई टीवी रिपोर्टर उन ट्रेनों में सफर करते हुए लोगों को समझाने में लगे रहे कि भारतीय ट्रेन और उनमें कितना फर्क है। यह दिखाने और समझाने की कोशिश की गयी कि किसी खिलौने की तरह अपने थैले में बुलेट ट्रेन रखकर ही मोदी लौटने वाले हैं। लोगों के दिमाग में मीडिया ने प्रधानमंत्री की ऐसी छवि पैदा कर दी मानों वे भारत को रातों रात बदल देंगे। ऐसा सोचने वाले कम लोग थे जो जानते थे कि यह सब दूर की कौड़ी है। इसके लिए तो पूरा रेल ट्रैक तक बदलना होगा। जो देश पुरानी पटरियों तक को बदलने में सक्षम नहीं, जहां तीन साल में नयी गाड़ियां चलाने के बजाय पहले से चल रही बहुत सी गाड़ियों को बंद किया जा रहा हो, ऐसे में तो बुलेट ट्रेन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आज रेलवे की यह स्थिति है कि पटरियां कमजोर हो चुकी हैं। कई स्थानों पर बार-बार पटरियां चटक रही हैं। कई बार टूटी पटरियों से रामभरोसे ट्रेनें गुजर जाती हैं। सौ की स्पीड वाली ट्रेन दिल्ली-बरेली ट्रैक पर कई जगह 20 किलोमीटर के औसत से रेंगने को मजबूर है। रेलमंत्री कहीं खो गये हैं। तीन साल से रेलवे सुधार के बजाय बिगाड़ की ओर है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला


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