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अफगानिस्तान : जहां लड़ाई पहले से खतरनाक हो रही है और कोई भी सुरक्षित नहीं

2001-2016 तक के आंकड़ों के अनुसार अफगानिस्तान में एक लाख से अधिक मौतें हो चुकी हैं.

अफगानिस्तान के काबुल में हुए धमाके में दर्जनों जाने चली गयीं। भारत और जर्मन दूतावास के करीब हुए इन आतंकी धमाकों में आसपास की इमारतें दहल गयीं और उनकी खिड़कियां तहस-नहस हो गयीं। बीते सालों में यह सबसे खतरनाक हमला माना जा रहा है।

हालांकि हमले की जिम्मेदारी से तालीबान ने मना किया है। शक की सूई आइएसआइएस पर जा रही है।

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धमाके जगह और समय की वजह से महत्व रखते हैं। उस समय वहां आवाजाही सबसे अधिक थी। यह रमजान का महीना भी है।

यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया हमला है। आइएसआइएस ने पिछले दिनों बगदाद में ऐसा ही हमला किया था।

अफगानिस्तान के सबसे सुरक्षित इलाके में जहां दूतावास हैं, वहां धमाका करने का उद्देश्य साफ था। दूतावास कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा हताहत करना ताकि विश्वस्तर पर अफगानिस्तान को उबारने की कोशिशें चल रही हैं, उनपर विराम लग सके।

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धमाके के पैमाने की बात की जाये तो वह अबतक के धमाकों में खतरनाक था। उसने एक ऐसा संदेश दिया कि लड़ाई वीभत्स होती जा रही है और कोई भी सुरक्षित नहीं। भय और खौफ ही चाहते हैं हमलावर। यह भी माना जा रहा है कि अमेरिकी आर्मी को एक जवाब है क्योंकि उन्होंने 'मदर आफ आल बम्ब’ अफगानिस्तान में आइएसआइएस को निशाना बनाकर गिराया था।

पिछले छह महीने में तालीबान का प्रभुत्व बढ़ा है। कुंडूज में तालीबान वापस आ गया है। साथ ही दूसरे इलाकों में भी उसका असर देखा जा रहा है। आइएसआइएस भी मजबूती के साथ अफगान धरती पर अपने पैर जमा रहा है।

अभी 8000 से अधिक अमेरिका के जवान अफगानिस्तान में हैं जिनमें छह हजार नेटो और साझा देशों के हैं। पिछले साल ही अकेले 6500 अफगानी सैनिक मारे जा चुके हैं और ढेरों घायल हुए हैं।

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तालीबान की जड़ें देश में मजबूत हैं। वे राजनीतिक तौर पर भी सक्ष्म हैं और देश पर उसका असर देखा जा सकता है। वहीं आइएसआइएस शुरुआत में है और कई इलाकों के लिए तालीबान से उसकी झड़प होती रहती है। तालीबान नहीं चाहता कि आइएसआइएस यहां जड़ें जमाये।

अफगान और नेटो सेनाओं को तालीबान और आइएआइएस दोनों से लड़ना पड़ रहा है। हाल में देखा गया है कि अमेरिकी फौजों ने आइएसआइएस को अधिक निशाना बनाया है। ऐसा इसलिए किया है क्योंकि विश्वस्तर पर यह संगठन मजबूत हो रहा है। अगस्त 2010 में सबसे अधिक एक लाख अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान की धरती पर थे। उसके बाद से इनकी संख्या कम की जाती रही है। मार्च 2017 तक करीब आठ हजार सैनिक बचे हैं।

2001 से 2016 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो अफगानिस्तान में एक लाख से अधिक मौतें हो चुकी हैं। 31 हजार से अधिक अफगानी नागरिक हमलों की भेंट चढ़ चुके हैं। वहां की सेना और पुलिस मिलाकर 30 हजार के करीब मारी जा चुकी है। चार हजार के आसपास वे लोग मारे गये हैं जिनमें पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आदि शामिल हैं। अमेरिकी सेना के भी दो हजार से अधिक जवान आतंकियों का निशाना बने हैं। साझा सेनाओं के एक हजार से अधिक जवान मारे गये हैं।

एक अनुमान के मुताबिक अफगानिस्तान में 42 हजार से कुछ ज्यादा तालीबान व अन्य आतंकी हैं। उनमें 35 हजार लड़ाके सक्रिय रहते हैं। तालीबान ने 37 प्रतिशत देश पर अपना कब्जा जमाया हुआ है।

-टाइम्स न्यूज़ ब्यूरो.


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