Header Ads

बैंकों में नकदी संकट बरकरार, किसान और व्यापारी परेशान

24 घंटे सेवा देने वाले एटीएम में से दस-पन्द्रह प्रतिशत एटीएम ही काम कर रहे हैं.

नोटबंदी 8 नवंबर में पिछले साल की गयी थी। आठ मई को उसे छह माह हो जायेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि मुझे पचास दिन का समय दे दो उसके बाद यदि कोई दिक्कत हो तो किसी भी चौराहे पर खड़ा करके, कुछ भी सजा दोगे तो मैं स्वीकार करुंगा। पचास दिन तो क्या छह माह में भी बैंकों में नकदी संकट समाप्त नहीं हुआ। 24 घंटे सेवा देने वाले एटीएम में से दस-पन्द्रह प्रतिशत एटीएम ही काम कर रहे हैं। अधिकांश एटीएम नकदी के अभाव में बहुधा बंद रहते हैं। छुट्टियां आने पर तो एटीएम से नकदी मिलना दुर्लभ हो गया है जबकि एटीएम चार्ज उपभोक्ताओं से नियमित और पूरा वसूला जा रहा है।

बैंकों में नकदी संकट बरकरार

यही नहीं ग्रामांचलों और कस्बाई इलाकों में स्थापित बैंक शाखाओं में और भी बदतर हालात हैं। लोगों का कहना है कि दो हजार तक के चैक का भी भुगतान नहीं किया जा रहा। प्रबंधक और कैशियर कह देते हैं कि जब कैश ही नहीं तो कहां से दें। कभी कहा जाता है, बैठिये कैश आ जायेगा तो मिल जायेगा। त्वरित पैसे की जरुरत वाले गरीब और मजदूरी कर पेट पालने वाले अपना जरुरी और मजदूरी का काम बंद कर अपने कमाये पैसों को लेने में भी उतना समय खर्च करने को मजबूर हैं जितना समय खर्च कर उन्होंने उन्हें कमाने में लगाया था।

बैंकों में नकदी संकट का सामना करने वालों में केवल निचले तबके के लोग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े व्यापारी भी शामिल हैं। अमरोहा जनपद के मंडी धनौरा कस्बे की बैंक शाखायें नकदी संकट से बुरी तरह जूझ रही हैं। यहां के व्यापारी आयेदिन इस समस्या से जूझते हुए जब परेशान हो गये तो उ.प्र. उद्योग व्यापार मंडल के प्रतिनिधियों ने 27 अप्रैल को मंडी धनौरा की एसडीएम प्रवीणा अग्रवाल को एक ज्ञापन देकर नकदी संकट का रोना रोया और इससे चौपट होते व्यापार को बचाने के लिए समाधान की गुजारिश की। हालांकि उन्होंने ज्ञापन में कुछ अत्यंत स्थानीय समस्याओं का भी उल्लेख किया था लेकिन नकदी संकट से वे बहुत परेशान थे। शहर में स्टेट बैंक, सिंडीकेट बैंक तथा पंजाब नेशनल बैंक जैसी राष्ट्रीय बैंकों की शाखायें हैं। ऐसे में भुगतान संकट होना अर्थव्यवस्था की कमजोरी का संकेत नहीं तो और क्या है?

किसान और व्यापारी परेशान

भुगतान संकट का असर सरकारी गेहूं क्रय केन्द्रों पर भी दिख रहा है। सभी किसान गेहूं की मंड़ाई कर अनाज घर ले आये तथा ज्यादातर ने उसे बेच भी दिया लेकिन सरकारी केन्द्रों पर लक्ष्य से बहुत कम खरीद हो पायी है। इसके पीछे भी भुगान संकट बड़ा कारण है। सरकार ने घोषणा की थी कि गेहूं खरीद का पैसा सीधा किसानों के खाते में भेजा जायेगा। जिन किसानों ने सरकारी तौल पर शुरु में गेहूं बेच दिया, उनके खातों में या तो समय से पैसा नहीं आया अथवा आया तो बैंक पैसा न आने का बहाना कर उसे परेशान कर रहे हैं। इससे अधिकांश किसान आढतियों को नकद में गेहूं बेच रहे हैं। किसान नोटबंदी और फसलों का कम दाम मिलने से आर्थिक बदहाली में हैं, उसे जल्दी पैसे की जरुरत है। छोटे किसान अपनी गेहूं बाजार में ले जाकर खर्चा बढ़ाने के बजाय गांव में ही फुटकर व्यापारियों को बेचने को मजबूर हैं।

नोटबंदी के बाद से बैंकों की बिगड़ी भुगतान संतुलन की हालत सुधरने के बजाय और बदतर ही हुई है। जिसके सुधार का कोई प्रयास सरकार की ओर से फिलहाल होता नहीं दिख रहा।

-जी.एस. चाहल.


Gajraula Times  के ताज़ा अपडेट के लिए हमारा फेसबुक  पेज लाइक करें या ट्विटर  पर फोलो करें. आप हमें गूगल प्लस  पर ज्वाइन कर सकते हैं ...

गजरौला टाइम्स की ताज़ा अपडेट प्राप्त करने के लिए अपना इ-मेल दर्ज करें :

Delivered by FeedBurner