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गेहूं का रकबा बढ़ने का सरकारी दावा खोखला निकला

न तो इस बार उत्तर प्रदेश में गेहूं गत वर्ष से अधिक क्षेत्र में बोया गया और न ही उत्पादन अधिक निकला.

यहां की मंडी में सरकारी क्रय केन्द्रों और आढतियों दोनों पर ही सामान्य से बहुत कम गेहूं आ रहा है। इसके पीछे व्यापारियों और केन्द्र प्रभारियों का मानना है कि किसानों ने गेहूं रोक लिया है। गत वर्ष दो हजार से ऊपर भाव चला गया था। किसान इस बार गत वर्ष से भी ऊपर भाव जाने की संभावना में गेहूं नहीं बेच रहे। हमने जिस आढती से पूछा, सबने यही वजह बतायी। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि इस बार गेहूं उत्पादन कम हुआ है।

गेहूं का रकबा बढ़ने का सरकारी दावा खोखला निकला

दिसंबर 2016 में नोटबंदी के दौरान सरकार की ओर से मीडिया में बार-बार दोहराया जा रहा था कि नोटबंदी का दुष्प्रभाव गेहूं बुवाई पर नहीं पड़ा, इस बार गत वर्ष से अधिक रकबे में गेहूं बोया गया है। इस सफेद झूठ को सच सिद्ध करने के लिए महीनों तक दोहराया गया। मीडिया ने इसे और भी तूल दिया। जिससे जनता में संदेश गया कि इस बार गेहूं उत्पादन अधिक होगा।

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गेहूं की फसल कटने से पहले ही बड़ा झूठ और फैलाया गया कि इस बार गेहूं की पैदावार गत वर्ष से अधिक निकल रही है। 25 कुंटल प्रति एकड़ से भी अधिक गेहूं निकलने का प्रचार शुरु कर दिया गया। अखबारों के क्षेत्रीय संस्करणों में देखा देखी सभी ने इसका प्रचार कर दिया।

न तो इस बार उत्तर प्रदेश में गेहूं गत वर्ष से अधिक क्षेत्र में बोया गया और न ही उत्पादन अधिक निकला। इसी के साथ व्यापारियों का यह मानना भी गलत है कि किसान गेहूं रोक गये हैं। खाने लायक गेहूं रोक कर अधिकांश किसानों ने अपना सारा गेहूं बेच दिया। केवल चंद बड़े किसान इसके अपवाद हैं।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.


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