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राष्ट्रपति चुनाव : पक्ष-विपक्ष की रणनीति तेज़

भाजपा के लिए कई छोटे दलों से समर्थन जुटाकर विजयी कोरम पूरा करना खास कठिन भी नहीं.

राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी सत्ता पक्ष और विपक्ष में गंभीरता से शुरु हो गयी है। भले ही समूचा विपक्ष मिलकर सत्ता पक्ष के उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा करने की सोच रहा हो लेकिन मौजूदा स्थिति में एनडीए का उम्मीदवार ही विजयी होगा। हालांकि एनडीए के कुनबे के कुल मत समूचे विपक्ष के मतों से 18 हजार कम पड़ रहे हैं। इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि समूचा विपक्ष इस विषय पर पूरी तरह एकजुट नहीं होने वाला। दूसरी ओर भाजपा के लिए कई छोटे दलों से समर्थन जुटाकर विजयी कोरम पूरा करना खास कठिन भी नहीं। वैसे भी सत्ताधारी दल अपना राष्ट्रपति बनाने में सफल रहते हैं।

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पिछली यूपीए सरकार का प्रमुख घटक दल कांग्रेस मौजूदा भाजपा के मुकाबले बहुत ही अल्पमत में था। वैसे भी उसके घटक दलों के वोट मिलकर भी बहुमत नहीं बना पा रहे थे। फिर भी कांग्रेस ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों ही पदों पर अपने उम्मीदवारों को आसानी से बैठाने में सफलता हासिल की थी। जबकि इस बार भाजपा उससे बहुत विशाल बहुमत में है तो उसे चिंता की खास जरुरत भी नहीं होनी चाहिए।

एनडीए सरकार में भाजपा को सबसे बड़ा खतरा अपनों से हो सकता है। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी केन्द्र की सरकार की कई नीतियों और निर्णयों की जितनी आलोचना उसका प्रमुख घटक दल शिवसेना करता रहा है उतनी कई बार विपक्ष ने भी नहीं की। हो सकता है शिवसेना अपनी पसंद का नाम सामने न लाने पर विरोधी मुद्रा अख्त्यार कर ले। वैसे अभी भाजपा की ओर से किसी नाम का खुलासा न होना यह संकेत माना जाना चाहिए कि भाजपा और संघ के शीर्ष नेतृत्व में इसपर गहन मंथन चल रहा है। अंदर से निकली फुसफुसाहट संकेत दे रही हैं कि संघ किसी वरिष्ठ संघ नेता को इस सर्वोच्च पद पर आसीन देखना चाहता है। जबकि भाजपा नेतृत्व ऐसा नहीं करना चाहता। वह कट्टर हिन्दुत्व के घेरे से बाहर निकलने की छवि बनाना चाहता है। इसपर मंथन चल रहा है। इसके बाद ही नाम सामने आयेगा।

उधर कश्मीर की लागतार बिगड़ती कानून व्यवस्था से सरकार दुविधा में है। वह चाहती है राष्ट्रपति चुनाव तक किसी तरह शांति से काम चले तो बेहतर होगा। यदि उसे सख्त रुख अपनाना पड़ गया तो उसके साथ सरकार में शामिल महबूबा मुफ्ती भी राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के खिलाफ जा सकती हैं। भाजपा को विपक्ष के बजाय ऐसे में अपनों से ही अधिक खतरा है।

उधर विपक्ष भले ही एकता का प्रयास कर रहा हो लेकिन उसमें भी कई नेता अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे। इनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यादव के नाम प्रमुख हैं।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष के साथ जाने को तैयार है। भले ही उसके पास बहुत कम ताकत है लेकिन वे भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। यह भी हो सकता है कि वे यह भी जानते हुए कि उनकी विजय नहीं होगी, फिर भी वे किसी स्वच्छ छवि के व्यक्ति को मैदान में लाकर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति ला सकते हैं। इससे भाजपा को लाभ होगा। तथा उसकी राह आसान होगी। लेकिन यह एक अटकल मात्र है और उस सिद्धांत के आधार पर कही जा सकती है कि राजनीति में कुछ भी संभव है।

-जी.एस. चाहल.


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