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पवित्र दीपोत्सव पर बारुद का काला साया

खुशी के मौके पर आतिशबाजी एक परंपरा बन चुकी है जिसने भयंकर रुप ले लिया है.

भारत त्योहारों और उत्सवों का देश है। यहां हर नया सवेरा कोई न कोई त्योहार की आहट का संदेश देता है। हमारे त्योहार मानव जीवन को खुशी और उल्लास से सराबोर तो करते ही हैं साथ ही आपसी एकता और सद्भावना का संदेश भी इसी के साथ जुड़ा होता है।

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दीपावली में अमावस्या की काली रात दीपमालाओं की झिलमिल रोशनी में स्वर्गोपम दृश्य का आनंद प्रदान करती है। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक माना गया है जो अज्ञान रुपी अंधकार का नाश करता है। इस दृष्टिकोण में भी यह पर्व बहुत महत्वपूर्ण है। त्रेतायुग में रावण का वध कर राम जब अयोध्या पधारे थे तो अयोध्या में प्रकाशोत्सव मनाया गया था जहां घर-घर दीपमालायें प्रकाश फैला रही थीं। कहा जाता है कि तभी से तमाम भारतीय इस त्योहार को बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।

एक एतिहासिक और बहुत महत्वपूर्ण घटना इसके साथ कलियुग में भी जुड़ी। मुगल बादशाह जहांगीर की कारागार से 52 हिन्दू राजाओं को दीपावली के मौके पर छठे गुरु हरगोविन्द साहिब मुक्त कराकर लौटे थे। उस समय अमृतसर में वहां और भी जोरदार ढंग से यह महापर्व मनाया गया था। दुनियाभर के गुरुद्वारों को दीपावली के अवसर पर दीपमालाओं से प्रकाशित किया जाता है।

यह पता नहीं पटाखों की परंपरा दीपावली के साथ कब से जुड़ी लेकिन आजकल दीपमालाओं से अधिक जोर पटाखों पर लगाया जाने लगा। खुशी के मौके पर आतिशबाजी एक परंपरा बन चुकी है जिसने भयंकर रुप ले लिया है। घनी आबादी, खासकर बड़े शहरों में आतिशबाजी के कारण सांस लेना दूभर हो जाता है। कई दिन तक जहरीली गैस पहले से प्रदूषित शहरों को और भी प्रदूषित किये रहती है। लोगों को अपने जीवन की सुरक्षा के प्रति सचेत होना चाहिए तथा पवित्र धार्मिक त्योहारों को विकृत होने से बचाना होगा। खुशियों के दीपोत्सव में प्रदूषण के जहर को घोलने से बचाना होगा।

-जी.एस. चाहल.


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