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गन्ने के सहारे चल रहे हैं कई बड़े व्यवसाय

sugarcane plant
सरकार के इस कदम का किसान विरोध कर रहे हैं। वैसे भी चीनी मिलों के रवैये से परेशान किसान गन्ना रकबा घटाते जा रहे हैं। बहुत से किसानों ने गन्ना उत्पादन से तौबा कर ली है। यह हमारी बरबादी के स्पष्ट संकेत हैं।

गंभीरता और ईमानदारी से सोचा जाये तो गन्ना भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस व्यवसाय से किसान, मजदूर, ट्रांसपोर्टर, पढ़े-लिखे कुशल लोग तथा अनेकों प्रकार के उद्योग धंधों में जितने लोगों को रोजगार मिलता है उतना दूसरे किसी भी उत्पाद से नहीं मिलता। हम लोग केवल गन्ना और चीनी तक सीमित रह जाते हैं जबकि इसके बिना देश के दूसरे दर्जनों व्यवसायों और करोड़ों लोगों के रोजगार पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। जिससे केवल गन्ना उत्पादक ही नहीं बल्कि परोक्ष रुप से एक लम्बी श्रंखला के तहत लाभान्वित समाज के एक बड़े तबके को भी झटका लगेगा।
 हम यदि गन्ना उगाने तक लगे समुदायों पर ध्यान दें तो किसान के साथ इससे गैर गन्ना उत्पादन करने वाली आबादी भी अपना पेट पाल रही है। निराई गुड़ाई और कटाई से मिल तक ढुलाई में ही गन्ना उत्पादकों से ज्यादा कमाई दूसरे लोग कर लेते हैं। गांवों में ऐसे भूमिहीन लोग भी हैं जो दूध और मांस के लिए पशुपालन करते हैं। नवम्बर से मार्च के अंत तक उन लोगों को गन्ना छीलने के बदले चारा मिलता है। दुग्ध व्यवसाय बहुत कुछ गन्ने पर निर्भर है। गांवों में दुग्ध के सहारे किसान, दूधिये, डेयरियां और हलवाईयों को भी रोजगार मिल रहा है। यदि गन्ना ना उगाया जाये अथवा इसके उत्पादन में गिरावट होती है तथा भूसे तथा वैकल्पिक चारे के भाव आसमान छूने लगते हैं। जिससे दूध और उससे बनने वाले पनीर, क्रीम, घी तथा मिठाइयों और अन्य पकवानों के भाव आसमान छूने लगते हैं।
  हमारी युवा पीढ़ी में सुरा सेवन की लत बहुत तेजी से बढ़ी है। अधिकांश शराब गन्ने के शीरे से बनती है। हमारी सरकार उसे और बढ़ावा दे रही है जिससे जगह-जगह वाइन शाॅप खोल दी गयी हैं। इसपर भारी भरकम करों से सरकारों को बहुत आय है। साथ ही इस व्यवसाय में एक बड़ी आबादी लगी है। कई महंगे कैमिकल बनाने में भी गन्ने का रस तथा शीरे का बड़ा योगदान है। बताया जाता है कि गजरौला की जुबिलेंट कम्पनी के अधिकांश उत्पाद गन्ने के शीरे और रस के द्वारा ही तैयार किये जा रहे हैं। यह एशिया की विशाल कम्पनी है जिसने प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से लोगों को भारी संख्या में रोजगार दिया है। 
  गन्ने के रस से पैट्रोल में मिलाया जाने वाला एथनाॅल भी तैयार होता है। गन्ने से चीनी, गुड़, शीरा, मैली और खोई मिल वालों को आर्थिक लाभ प्रदान करती है। इन मिलों के सहारे बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है। गन्ना सप्लाई और उत्पादन में लगे ट्रैक्टर, ट्राली, हल, हैरो आदि यंत्रों के निर्माताओं तथा उनके कारखानों में काम करने वाले कामकारों को भी रोजगार मिलता है। साथ ही ढुलाई में लगे ट्रकों आदि के निर्माताओं का रोजगार भी इससे बढ़ता है। बहुत गहराई में जाने के बजाय उपरोक्त सरसरी निगाह से यह पता चल जाता है कि गन्ना देश के हर वर्ग को रोजगार देने का सबसे बड़ा साधन है। अतः इसकी खेती को बढ़ावा देने से रोजगार में वृद्धि तो होगी ही साथ ही कई चीजों की महंगायी भी काबू में रहेगी।
  फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में गन्ना खेती को जल संरक्षण का बहाना बनाकर हतोत्साहित करने की योजना बना रही है। इसके लिए दलहन खेती तो बढ़ावा देने के नाम पर सरकारी धन का अनावश्यक खर्च बढ़ाने का ढंग भी निकाला जा रहा है। सरकार के इस कदम का किसान विरोध कर रहे हैं। वैसे भी चीनी मिलों के रवैये से परेशान किसान गन्ना रकबा घटाते जा रहे हैं। बहुत से किसानों ने गन्ना उत्पादन से तौबा कर ली है। यह हमारी बरबादी के स्पष्ट संकेत हैं।

-जी.एस. चाहल