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बाजार से खरीदा धागा नहीं है राखी

rakhi
भारत विविध धार्मिक परंपराओं और त्योहारों का देश है। विश्व के जिस कोने में भी कोई भारतीय बसा है वह अपने धार्मिक पर्वों, त्योहारों और परंपराओं को किसी न किसी रुप में युगों युगों से मनाता आ रहा है। इन्हीं में से रक्षाबंधन एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे भाई-बहन के पवित्र प्रेम के रुप में सभी जगह मनाया जाता है। मान्यतानुसार भाई आजीवन बहन की सब प्रकार से इस अवसर पर सुरक्षा का वचन देता है। बहन भी अपने भाई को मंगलकामनाओं के साथ उसके दीर्घजीवी होने की शुभकामनायें देती है।

  सामाजिक संरचना को संयमित रुप से संचालित रखने को हमारे पूर्वजों ने हमें कई बंधनों और संस्कारों में नियंत्रित किया है। उन्हीं में हमारे इस तरह के रीति रिवाज भी हैं। जिनमें माता-पिता, बेटा-बेटी, भाई-बहन, पति-पत्नि आदि पारिवारिक रिश्ते और उनकी सीमाओं का भी निरधारण किया गया है। इन्हीं के बीच से होकर हमारे नैतिक और अनैतिक आचरण का मार्ग निकलता है। हमारे त्योहार और सांस्कृतिक पर्व समय-समय पर उपस्थित होकर हमें हमारे दायित्वों और नैतिकता के साथ लोकाचार व सामाजिक सामंजस्यता का स्मरण भी कराते रहते हैं।

  मौजूदा आर्थिक भागदौड़ की दुनिया में मानवीय मूल्यों के साथ जहां नैतिकता में गिरावट आयी है वहीं लगता है हमारे समाज में मौजूद सबसे मजबूत भाई-बहन के बीच की आर्थिक ताकत ने दरार डालनी शुरु कर दी है। आज राखियां बाजारवाद की रौनक बनती जा रही है। भाई-बहन के प्यार की कीमत राखी की कीमत को देखकर लगाने का फैशन शुरु हो गया है। बहुत सी बहनें बेचारी राखियां और मिठाईयों के डिब्बे खरीदने में ही लुट बैठती है। बहन भी गरीब और भाई भी गरीब। उधर वह भी सोचता है कि बेचारी पता नहीं कितना खर्च कर तेरे पास तक आयी है। तू उसे खुश करके भेज। कुछ लोग देखा देखी बढ़चढ़ कर लेन देन करने का रिवाज इसे बनाते जा रहे हैं तथा एक दहेज का ही छोटा रुप यह त्योहार ले चुका है। थोड़े अंतराल पर ही भैया दूज इसी के समानान्तर एक और त्योहार शुरु कर दिया है। उसमें नारियल अनिवार्य है। कुल मिलाकर व्यापारी वर्ग का बरसात में अच्छा व्यवसाय चलाने का यह शुभ अवसर है। भाई-बहन का प्यार तो बिना नारियल के भी उतना ही रहता है लेकिन लाला का नारियल और दूसरे सामान भी तो बिकने चाहिए। जब श्रद्धा, प्रेम और सौहार्द को बाजारवाद से जोड़ दिया जाता है तो इस तरह के पवित्र त्योहारों का उद्देश्य, भावना और चरित्र स्वतः समाप्त होने शुरु हो जाते हैं।

  यदि हमारी भावना प्रेम और त्याग की है तो किसी के हाथ में किसी गन्डे ताबीज या महंगी राखियां बांधने के बजाय प्रतीक स्वरुप एक मामूली धागा हम किसी राह चलती अनजान महिला को बहन कहकर उससे अपनी कलाई में बंधवा लें तो उसकी शक्ल तो क्या उसकी परछाईं में भी हमें अपनी मां की कोख से उत्पन्न बहन के साक्षात दर्शन होंगे।

  भाई बहन का रिश्ता हजारों रुपयों की महंगी राखियों और मिठाई के डिब्बों में कैद नहीं है। राखी एक ऐसा पवित्र और अदृश्य धागा है जिसे जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर बांधती है तो भाई को दूसरों की बहन बेटियों में भी अपनी बहन की छवि नजर आने लगती है।

-जी.एस. चाहल

शिक्षक कर रहे राजनीति- अधिकारी मौज में
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