Header Ads

विकास के बजाय वैचारिक घुट्टी पिलाने का प्रयास


आजाद भारत में केन्द्र और राज्यों में जो भी सरकारें आयीं वे किसी न किसी विशेष वादे और दावे के सहारे ही जनता को आकर्षित करने में सफल रहीं। सभी दलों ने चुनावों से पूर्व जनसेवा के हर बार वायदे किये लेकिन बाद में नेताओं ने देश व जनता से ऊपर अपने दल और उसके सुप्रीमो के प्रति निष्ठा व्यक्त की। अधिकांश दलों का अपना अलग-अलग वैचारिक एजेन्डा रहा है जिसे वे सत्तारुढ़ होते ही इस बहुभाषी, बहुजातीय तथा बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत वाले राष्ट्र की सांझा संस्कृति पर थोपने का प्रयास करते रहे हैं। इससे हमारी धर्मनिरपेक्ष संघीय व्यवस्था को प्रभावित करने का लगातार प्रयास किया जाता रहा है।

बीते कई दशकों से केन्द्र में मिलीजुली सरकारों के गठन तथा राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की सरकारों के कारण संघीय ढांचे की कार्यप्रणाली पर केन्द्र की मजबूत पकड़ नहीं बन पा रही थी। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार लोहियावाद के नाम पर, बंगाल की तृणमुल सरकार अपनी व्यक्तिगत वैचारिक हठधर्मिता, बिहार में जदयू-भाजपा युद्ध, हरियाणा में वडेरा का भू-घोटाला, आंध्र-तेलंगाना विभाजन विवाद, दक्षिण राज्यों में अलग-अलग क्षत्रप अपनी-अपनी ठपली और अपने-अपने एजेंडे थोपने का प्रयास कर रहे थे। ऐसे में केन्द्र में जो भी सरकार रही वह कांग्रेस की नीतियां थोपने, अपनी सरकार को बचाये रखने के लिए राज्य सरकारों और साझीदारों को संतुष्ट करने में अधिकांश समय और बल खर्च करती रहीं।

राज्य सरकारों में उत्तर प्रदेश को लें यहां लंबे समय से कांग्रेस सत्ता से बाहर है। यहां भाजपा$बसपा, बसपा, सपा दशकों से सत्ता में हैं। सपा व बसपा जहां मिलीजुली सरकारों का नेतृत्व कर चुके वहीं एक-एक बार दोनों अपने-अपने दम पर भी सत्ता में आ चुके हैं। कानून व्यवस्था और विकास योजनाओं को लागू कराना तथा उनका संरक्षण राज्य सरकारों का काम होता है। अतः यदि आवश्यक योजनाओं में केन्द्र से जरुरत पर धन मिलता रहे और राज्य का विकास न हो तो उसके लिए राज्य सरकार उत्तरदायी है। उत्तर प्रदेश को बसपा और सपा के शासन में केन्द्र से विकास के नाम पर जितना धन मुहैया कराया गया है वह अपने आप में रिकार्ड है। पिफर भी इस राज्य का विकास में पिछड़ना किस ओर इशारा करता है?

चुनावों के दौरान बसपा, सपा और भाजपा तीनों उस पार्टी को प्रदेश की बदहाली के लिए कोसती रही हैं जिसकी यहां कई दशक से सरकार ही नहीं है। जबकि सरकार इन दलों की ही बनती आ रही है। बसपा सरकार ने जनता के विकास के धन को अपनी पार्टी की विचारधारा के प्रचार पर खर्च किया। सपा वाले लोहियावाद के प्रचार पर खर्च कर रहे हैं। भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि पर आगे बढ़कर एक वर्ग विशेष के तुष्टीकरण के प्रयास में जुट गयी है। जबकि लंबे समय बाद केन्द्र को मिली एक विशाल बहुमत की सरकार को किसी पार्टी या नेता विशेष के विचारों को थोपने से बचना चाहिए। सरकार किसी दल या संस्था की नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक देश की है। 

-जी.एस. चाहल