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महाराष्ट्र और हरियाणा में मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर

पन्द्रह अक्टूबर को महाराष्ट्र और हरियाणा में होने वाले चुनावों की हारजीत से केन्द्र में मौजूद भाजपा सरकार की कुरसी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला परंतु इन दो राज्यों की जनता यह संकेत जरुर दे देगी कि केन्द्र की मोदी सरकार के काम को वह पसंद करती है या नहीं अथवा वह चार माह के कार्यकाल में उसकी उम्मीदों पर खरी उतरी है अथवा नहीं। हालांकि बीते सभी उपचुनावों में मोदी सरकार को जनता ने नकारा है।

हम सभी देख रहे हैं कि पाकिस्तान की ओर से जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र में हमारे रिहायशी इलाके में लगातार गोलीबारी जारी है। लोग मारे जा रहे हैं। गांव वाले गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर पलायन कर रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री को इस बात की कोई चिंता नहीं कि वे पाकिस्तान के हमले का जबाव देने अथवा उसके खिलाफ जबावी कार्रवाई कराने के बजाय महाराष्ट्र और हरियाणा की चुनावी सभाओं में भाषणबाजी में व्यस्त हैं। उन्हें पाक से अधिक यहां की विपक्षी पार्टियों से खतरा है। उन्हें अपने सिपहसालारों पर चुनावी जंग में जीत का भरोसा नहीं। मनसे प्रमुख राज ठाकरे का ठीक ही कहना है कि नरेन्द्र मोदी अब प्रधानमंत्री हैं, उन्हें दिल्ली से पूरा देश देखना चाहिए। राज्यों को राज्यस्तरीय नेताओं को देखने दें। सीमा पर हमले हो रहे हैं उसे प्रधानमंत्री दायित्व के साथ संभालें।

हरियाणा में तो यह दिखाई देने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल और कांग्रेस के बाद तीसरे स्थान पर रहेगी। भले ही वहां लोकसभा चुनाव में गठबंधन के चलते वे कांग्रेस को साफ कर गयी थी। सत्ता में आने के बाद केवल उद्योगों का राग अलापने तथा किसानों को बिल्कुल भूल जाने के कारण कृषि प्रधान इस राज्य में भाजपा के प्रति काफी नाराजगी है।

इस बार नरेन्द्र मोदी की सभाओं में यहां भीड़ बहुत कम है। इनेलो से गठबंधन टूटना और पंजाब के अकाली दल बादल का भी खुलकर भाजपा के बजाय इनेलो के समर्थन में खुलकर प्रचार करना, सभी किसान समर्थक दलों का एक हो जाना भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

मजेदार बात यह है कि अकाली दल बादल पंजाब और हरियाणा में तथा इनेलो हरियाणा में किसानों के समर्थक राजनैतिक दल हैं जो लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन में थे। इस समय उसके खिलाफ एक मंच पर इन दोनों के आने का भी यही कारण है कि वे भाजपा को किसानों के साथ धोखा करने की सजा विधानसभा चुनाव में दिलाना चाहते हैं।

चौ. ओमप्रकाश चौटाला और स. प्रकाश सिंह बादल की सभाओं में किसानों की भारी भीड़ हो रही है जो इस बात का संकेत है कि इस बार पलड़ा इनेलो का भारी रहेगा। भूपेन्द्र हुड्डा भी जी जान से प्रचार में जुटे हैं। मीडिया प्रचार में भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा छाये हुए हैं लेकिन जनता के बीच इनेलो नेता गांव-गांव तक जनसंपर्क में अपने कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं।

चुनाव अभियान वास्तव में पूरे जोर पर है। फिर भी प्रतिष्ठा तो पीएम नरेन्द्र मोदी की ही दांव पर है। क्योंकि चार माह पूर्व की ‘लहर’ में सारी लोकसभा सीटें जीतने के बाद यदि भाजपा यहां सरकार बनाने में विफल रहती है यह उनकी विफलता मानी जायेगी। यदि भाजपा भारी बहुमत से विजयी रही तो यह माना जायेगा कि अभी मोदी जादू बरकरार है।

महाराष्ट्र का चुनाव बहुकोणीय चुनाव हो चुका। वहां सभी गठबंधन अपने-अपने स्वार्थों के कारण ठीक चुनाव से पूर्व टूट गये। जहां दिल्ली देश की राजनीति की राजधानी है ठीक उसी तरह मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। पूंजीवादी दौर में आर्थिक राजधानी का महत्व बढ़ जाता है। प्रधानमंत्री यहां बार-बार सभायें कर रहे हैं। यहां के मुख्यमंत्री पद की कुरसी को लेकर ही सीटों के बंटवारों का झगड़ा चल रहा था।

मायानगरी की तमाम माया भी इसी कुरसी के इर्द-गिर्द वास करती है। इसी के चक्कर में दशकों से बने बनाये गठबंधनों की गांठें भी टूट गयीं। कुरसी लपकने को गठबंधन नयी शक्ल ले लेंगे।

टूटी गांठे तो नहीं जुड़तीं, लेकिन दूसरी गांठ बांध ली जाती है। कुरसी के लालच में यहां बार-बार गांठे लगी हैं और गठबंधन बने हैं। उनका कारण यही है कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है।

बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार तो यहीं से चलने हैं। ऐसे में यहां की राज्य सरकार का मुखिया एक विशिष्ट मुख्यमंत्री की हैसीयत रखता है। पीएम मोदी के महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवाना और भी बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल है लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वे अपनी प्रतिष्ठा बचा पायेंगे।

-जी.एस. चाहल.