कैसे रुके जहरीला दूध?

नकली दूध का कारोबार जोर शोर से जारी है। दिल्ली के निकट होने के कारण मुरादाबाद मंडल में इससे जुड़े मौत के सौदागरों की भारी तादाद है। जिस दूध को अमृत समान जीवनदायी माना जा रहा है। उसकी आड़ में लोगों को जहर बेचा जा रहा है। इस सबके लिए सबसे अधिक दोषी खाद्य विभाग है। उसी के साथ पुलिस और कई सफेदपोश भी इस धंधे में खूब सहयोग देते हैं।

खा्द्य विभाग ने खाद्य निरीक्षक से लेकर लखनऊ तक भारी संख्या में सरकार नौकरों की फौज रखी है। स्वास्थ्य विभाग भी इसमें अहम दायित्व निभाता है। इन महकमों का कर्तव्य है कि जनता को स्वच्छ, असली और स्वास्थ्य हितैषी खाद्य सामग्री और पेय पदार्थ उपलब्ध हो। जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की पूरी शक्तियां इनके पास हैं। फिर क्या कारण हैं कि ये  खामोश रहते हैं।

चाय—पानी से लेकर चांट—पकौड़ी वाले, अधिकांश हलवाई और दुग्ध व्यवसायी गंदे वातावरण में माल तैयार कर नकली घी, दूध, मिठाईयां, तेल और न जाने क्या—क्या नकली ही बेचते मिलेंगे। मिलावट सभी सीमायें लांघ रही हैं। कटे—फटे तथा सड़े फलों के ठेले  आपको खुलेआम सड़कों के किनारे खड़े मिलेंगे। अज्ञानतावश बहुत सारे लोग इन्हें खरीदते हैं और बाद में बीमार पड़ने पर उनकी लंबी कीमत अदा करते हैं। सिंथेटिक दूध और इसी तरह के मावे आदि से बनी मिठाईयां खुलेआम बाजारों में बिक रही हैं। कोई कहने सुनने वाला नहीं।

यदि नकली दूध पर नियंत्रण पाया जाये तो मिलावट खोरी को आधा रोका जा सकता है। लेकिन यह काम आसान नहीं। धन की अंधी दौड़ में अवैध कमाई का भाग अवैध कारोबारी, विभागीय कर्मचारियों, पुलिस और कई सफेदपोश को समय—समय पर देते रहते हैं। धन की भूख में अंधे तत्वों को ये काला कारोबार काला नहीं दिखता। यही कारण है कि खाद्य निरीक्षक या थाना पुलिस को सिंथेटिक दूध का कारोबार नजर नहीं आता जबकि डी.एम. को जिला मुख्यालय में बैठे ही पता लग जाता है। बाद में एसडीएम, खाघ निरीक्षक और पुलिस सक्रिय होती है और एक आध कारोबारी के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी सजगता का परिचय देती है। उसके बाद भी असली मुलजिम फरार हो जाते हैं। दूसरे पकड़ में आ जाते हैं।

जिला अमरोहा में सैकड़ों सिंथेटिक और मिलावटी दूध के कारखाने चल रहे हैं। जिनमें से अधिकांश के मालिक उससे पूर्व परिवार का भली प्रकार खर्चा चलाने में भी असमर्थ थे। इस खतरनाक धंधे से वे रातोंरात कुबेर बन बैठे और कई राजनीति भी कर रहे हैं। इस तरह के युवकों से प्रेरित होकर भी कई नये लोग इस धंधे में लिप्त हो रहे हैं। पुराने घाघों का संबंध नेताओं तथा पुलिस और प्रषासन तक में हो जाता है। यही कारण है कि उनपर कोई भी कर्मचारी हाथ डालने का साहस नहीं जुटा पाता।

उपरोक्त कारण ही हमारे समाज को विषाक्त दूध पीने को बाध्य कर रही हैं। और उक्त कारणों से ही यह धंधा बंद नहीं हो पाता।

-Gajraula Times news Amroha.

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