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गजरौला के विकास को पलीता लगाते रहे कौशिक

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स्व. रमाशंकर कौशिक प्रदेश स्तर की राजनीति में काफी समय तक एक प्रभावशाली भूमिका में रहे। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के वे घनिष्ठ सहयोगी रहे। इसके बावजूद उन्हें स्थानीय जनता का कभी भी समर्थन हासिल नहीं हुआ। यही कारण था कि वे मुलायम सिंह यादव द्वारा शुरु में मंत्री पद तक प्रदान करने के बाद अंत में सपा के उपेक्षित नेताओं की तरह उन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया। हां, यहां के चन्द ऐसे चाटुकार छुटभैये नेताओं के लिए वे आज भी महान समाजवादी आदर्श पुरुष की तरह हैं। इन्हीं में से कुछ लोग आज भी तमाम गजरौला को कौशिक के नाम करने की तमन्ना पाले रहते हैं। हालांकि रमाशंकर कौशिक चाहते तो पहले से विकास की पटरी पर चल पड़े अपने नगर को मंत्री बनने के साथ ही तेज रफ्तार प्रदान कर सकते थे। परंतु उन्होंने इसके विपरीत हमेशा गजरौला को विनाश की गर्त में धकेलने का ही अधिक प्रयास किया।

अधिकांश लोगों को मालूम है कि हसनपुर से आगे संभल रोड पर कालाखेड़ा में जो चीनी मिल लगा है वह गजरौला के लिए मंजूर हुआ था। उस मिल पर आज भी दि किसान सहकारी चीनी मिल गजरौला लिखा हुआ है। कागजों में वह गजरौला के ही नाम दर्ज है। रमाशंकर कौशिक ने उसे गजरौला में नहीं लगने दिया। इससे यहां के ग्रामीणों को लाभ पहुंचता।

वाम आर्गेनिक कैमी. नामक प्रदूषण वाहक कम्पनी को जब कहीं स्थान नहीं मिला तो वे यहां आ गयी। इसपर कौशिक ने कोई आपत्ति नहीं की। दरअसल गजरौला बेहतर यातायात सुविधाओं के कारण नारायण दत्त तिवारी के प्रयास से औघोगिक क्षेत्र बनाया गया था। कौशिक का इससे दूर का भी नाता नहीं था बल्कि वे नहीं चाहते थे कि यहां के लोग तरक्की करें। प्रमाण के लिए चीनी मिल ही बहुत है जबक ऐसे कई प्रमाण मेरे पास हैं जिनसे कौशिक का गैर समाजवादी चरित्र सबके सामने लाया जा सकता है।

गजरौला के लिए रमाशंकर कौशिक के कार्यकाल में एक आइटीआइ सरकार ने मंजूर की थी। मकसद था, औघोगिक क्षेत्र के नवयुवकों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाना। मजेदार बात यह रही कि स्वर्गीय समाजवादी नेता ने उसे मुरादाबाद भिजवा दिया। जबकि खादगूजर में स्व. विधायक महेन्द्र सिंह की बंद पड़ी आइटीआइ की इमारत में वह चल सकती थी। उसे इसके अलावा गजरौला में कहीं भी चलाया जा सकता था।

कौशिक जी के समय से हम उसे गजरौला लाने का प्रयास करते रहे। मैंने कई बार कई समाचार पत्रों में लिखा भी कि गजरौला की संस्था गजरौला में आनी चाहिए। यहां न तो किसी जनप्रतिनिधि और न ही जनता ने इसपर ध्यान दिया। बल्कि संस्था के प्राचार्य के प्रयास पर कराई कार्यवाही को हमारे नेताओं ने ठंडे बस्ते में डलवाया।

कोई बात नहीं प्राचार्य तथा मेरा प्रयास रंग लाया। हमने चुपचाप इसे गजरौला के बजाय छीतरा में उसे बनवाने में गत वर्ष सफलता प्राप्त कर ली। शानदार इमारत में 25 बीघा क्षेत्र में संस्था चालू है। कौशिक ने जिसे मुरादाबाद भेजा उसे हम अपने गांव ले गये। गजरौला लाते तो फिर वही होता —रमाशंकर कौशिक भक्त कहते, राहुल कौशिक ने बनवाई है। जाकर देख लें, संस्था पर बोर्ड लगा है —राजकीय आइटीआइ गजरौला—छीतरा।

यह प्रमाण सबसे बड़ा है कि कौशिक ने विकास के बजाय गजरौला के विनाश में ही अधिक योगदान दिया।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.