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पुरुषों का राजनैतिक हथियार बन गया महिला आरक्षण

पंचायतों तथा स्थानीय निकायों में नाम को तो महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्राप्त है और हकीकत में वे इतने ही स्थानों पर चुनी भी जाती हैं लेकिन यह भी एक हकीकत है कि उन्हें जनप्रतिनिधित्व कानूनों के अधिकार से वंचित किया जाता है। इसमें उनके परिवार के पुरुषों द्वारा उन्हें प्रदान शक्ति हथिया ली जाती है अथवा उन्हें इसके लिए बाध्य किया जाता है। इसमें निकाय प्रमुख और उनके सहयोगी अधिकारी पुरुष वर्चस्व तथा महिला दमन में पुरुषों का पूरा सहयोग करते हैं।

एक ओर प्रधानमंत्री तथा केन्द्र की भाजपा सरकार महिला सशाक्तिकरण का जोरशोर से प्रचार कर रही है। वहीं उनकी पार्टी के जनप्रतिनिधि जानबूझकर महिला अधिकारों का हनन कर रहे हैं।

गजरौला की नगर पंचायत बोर्ड की बजट बैठक में कोई भी महिला सभासद नहीं पहुंची जबकि यहां निर्वाचित 18 सभासदों में एक तिहाई यानि छह महिला सभासद हैं। महिला सभासदों के स्थान पर उनके पति बैठक में शामिल हुए। यही नहीं उन्होंने वाकायदा बैठक में कुछ मुद्दों पर सभासदों से सभासदों की तरह तर्क—वितर्क भी किया। कार्यवाही रजिस्टर पर महिलाओं के फरजी हस्ताक्षर भी इन्हीं लोगों ने किये। यही नहीं बैठक भत्ते के एक—एक हजार रुपये भी महिला सभासदों के नकली हस्ताक्षर बनाकर इन लोगों ने लिए। यह सारी धोखाधड़ी इ.ओ. कामिल पाशा की निगरानी में संपन्न हुई। कागजों पर पुरुषों द्वारा महिला सभासदों के हस्ताक्षर कर धन आहरण करना खुली धोखाधड़ी है। जिसके लिए इ.ओ. सबसे पहले उत्तरदायी है। इस प्रकरण की जांच की जानी चाहिए तथा चेयरमेन को सख्त कदम उठाते हुए बैठक में महिला सभासदों के बजाय पुरुषों के आने पर पाबंदी लगानी चाहिए।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.

last update : 17.02.2015