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केजरीवाल, भाजपा और किसान की मौत


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सोशल मीडिया पर अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ जमकर लिखा जा रहा है। आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान हुई राजस्थान के किसान की मौत ने एक अलग तरह की बहस को जन्म दे दिया है।

अधिकतर लोगों का सीधा आरोप यह है कि ‘आप’ की रैली में भाषणबाजी चलती रही और किसान फांसी पर लटक कर मर गया। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता क्यों मूक बने रहे। वे सारे माजरे को चुपचाप देखते रहे।

ट्वीट कर लोग आम आदमी पार्टी से पूछ रहे हैं कि क्या 'आप' इसलिए राजनीति में आये हो। स्वयं को किसानों की हितैषी कहने वाली यह पार्टी एक किसान को मरने से बचा नहीं सकी।

कुछ लोग तो उन्हें माफिया तक कहने से नहीं चूक रहे।

पुलिस क्या कर रही थी?

पुलिस को भी सोशल मीडिया में आड़े हाथों लिया गया है। कहा जा रहा है कि उस समय पुलिस अपना दायित्व निभा नहीं रही थी और वह भी मूकदर्शक बनी हुई थी। यहां तक की पुलिस का जवान इतनी हिम्मत नहीं जुटा सका कि वह गजेन्द्र सिंह को फांसी से रोक सके।

मीडिया पर भी उठ रहे सवाल

टीवी पत्रकार वहां काफी संख्या में मौजूद थे। उन्होंने शुरु से लेकर अंत तक सारा वाकया फिल्माया। वे उसे फिलमाने में ही व्यस्त रहे। मीडिया के लोगों की मौजूदगी में किसान मर गया। सोशल मीडिया पर मीडिया की उदासीनता और संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं। टीआरपी आदि की चर्चा भी खुलकर की जा रही है।

सियासी रंग चढ़ रहा है

किसान की मौत पर सियासी रंग चढ़ रहा है। भाजपा की ओर से संबित पात्रा विनम्र होकर आम आदमी पार्टी के नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि नेताओं को उसी समय भाषणबाजी बंद कर मंच से उतरकर किसान के पास जाना चाहिए था। लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता भाषण देने में व्यस्त रहे।

विपक्ष खुलकर आरोप लगा रहा है। आम आदमी पार्टी की ओर से भी इस मसले पर अपनी सफाई देने का कार्य चल रहा है।

भाजपा के किसान विरोधी विधेयक के कारण यह हुआ

सोशल मीडिया पर भाजपा की भी इस मसले पर खिंचाई की जा रही है। आरोप लगाये जा रहे हैं कि यदि भाजपा भूमि अधिग्रहण बिल न लाती तो किसान को फांसी पर लटकने की जरुरत न पड़ती। सारा विवाद भाजपा की वजह से पनपा है।

कुल मिलाकर राजनीति हो रही है, लेकिन किसान के परिवार को सांत्वना देने के लिए सोचने वाले बहुत कम हैं।

-टाइम्स न्यूज़.