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किसान मरेंगे तो व्यापारी और उद्योगपति कैसे बचेंगे?

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पूरे उत्तर भारत में किसानों की आत्महत्याओं में अचानक तेजी आयी है तथा यह सिलसिला थमने के बजाय और तेजी पकड़ रहा है. केन्द्र में किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने का वादा करने वाली भाजपा सरकार को अभी एक साल भी नहीं हुआ. इतने अल्प समय में ही उसके किसान और गांव विरोधी फैसलों ने किसानों को तोड़ कर रख दिया. इस सरकार के कार्यकाल में अभी तक यह तीसरी फसल है जिसमें किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ेगा.

नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान बार-बार दावा किया था कि उनकी सरकार किसानों की फसलों पर पचास फीसदी मुनाफा दिलायेगी. किसान झांसे में आ गये और केन्द्र की संप्रग का तख्ता पलट कर भाजपा को मुंहमांगा बल्कि उससे भी बड़ा बहुमत प्रदान कर दिया. परंतु इस सरकार के कार्यकाल में जब किसानों की धान की फसल आयी तो सरकार ने गत वर्ष से मूल्य कम कर दिया, नमी प्रतिशत भी घटाया गया, जिसका खामियाजा किसानों को चार से पांच सौ रुपये प्रति क्विंटल का कम मूल्य मिलने से भुगतना पड़ा. कई जगह सरकारी तौल ही नहीं हुई. आढ़तियों ने मनमाने रेट पर धान लूट लिया.

परेशान किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड अथवा दूसरे साधनों से पैसा निकालकर रबी की फसल की तैयारी कर दी. उन्हें अभी भी भरोसा था कि मोदी सरकार अपने वादे पर शायद गन्ने की अच्छी कीमत दिलवा देगी और गेहूं का भी पचास फीसदी लाभ उसे मिल जायेगा. मोदी के भरोसे किसानों ने कर्ज के सहारे फसलों पर खूब खर्च कर उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया.

गेहूं और तिलहन पर खर्च के साथ परिश्रम भी खूब किया. लिहाजा इस बार रबी की फसल देखने लायक थी. रबी तैयार हो रही थी और जनवरी—फरवरी में गन्ना किसानों की लूट और पिटाई का काम जारी था. केन्द्र और राज्य दोनों सरकारें मिल मालिकों को लाभ पहुंचाने में संलग्न थीं. गत वर्ष से गन्ने का भाव बढ़ने के बजाय और कम हो गया. मिलों ने धीमी पेराई करनी शुरु कर दी और भुगतान बेहद देर से तथा 280 रुपये के बजाय 240 रुपये प्रति क्विंटल ही किया जाने लगा. क्रेशर और कोल्हुओं पर गन्ना डालना किसान की मजबूरी हो गया. जहां डेढ़ सौ से एक सौ रुपये तक लूट मची थी.

धान की फसल के बाद गन्ने का और भी बुरा हाल था. अबतक किसान का धैर्य जबाव देने लगा था. कई परेशान किसान फसलों की लुटाई के कारण बरबाद होकर आत्महत्याओं की ओर बढ़ चले थे. सरकारें, खासकर भाजपा नीत केन्द्र सरकार अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थक रही थीं और नरेन्द्र मोदी अभी भी दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं, उन्हें अपने ’मन की बात’ की ही बात करनी है. दूसरों के मन की बात वे सुनना ही नहीं चाहते.
धान और गन्ने की बरबादी के बाद अब गेहूं और सरसों की फसल से कुछ उम्मीद बाकी थी. उस समय बरसात और ओलावृष्टि ने पकने को तैयार खड़ी इस फसल को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जिन किसानों का दम धान, गन्ना और आलू की बेकदरी ने निकाल दिया था उससे बचे किसानों की सांसें गेहूं पर हुए बज्रपात से थमनी शुरु हो गयी हैं. अन्नदाता साहस खोता जा रहा है. आयेदिन अकेले उत्तर प्रदेश में ही दर्जन भर किसानों की आत्महत्याओं की खबरें हैं.

सपा सरकार के एक मंत्री ने पिछले दिनों कहा कि किसी भी किसान ने आत्महत्या नहीं की.
यदि रबी की फसल पर ओलावृष्टि न हुई होती, तब भी केन्द्र सरकार ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि इस बार एफसीआई एक मुट्ठी अनाज भी नहीं खरीदेगा. किसानों को लाभ दिलाने वाली मोदी सरकार पहले ही गेहूं खरीद को दलालों और धन्ना सेठों को खरीदने का रास्ता साफ कर चुकी थी. अब थोड़ा चोट ऊपर वाले ने भी कर दी. जबकि सरकारी आंकड़े गेहूं उत्पादन में ओलावृष्टि से मात्र 2 फीसदी की ही कमी मान रहे हैं. यह इसलिए किया जा रहा है जिससे किसानों के जो दाने बचे हैं कहीं उनकी उन्हें ठीक कीमत न मिल जाये.

हालांकि केन्द्र सरकार किसानों का हिमायती होने का अभी भी नाटक कर रही है. कहा गया है कि रबी की फसल की क्षति का आकलन किया जा रहा है और मंत्रियों तथा सांसदों को क्षेत्र में भेजा जा रहा है. सभी जानते हैं अथवा कहा जा सकता है कि किसान धान, गन्ना, आलू, टमाटर, प्याज आदि फसलों का उचित मूल्य जिस सरकार की नीतियों के चलते नहीं ले पाये, उससे गेहूं या तिलहन में किसी लाभांश की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है?

गन्ना मूल्य तय करने और उसे समय से हासिल करने के लिए किसान सड़क से कोर्ट तक लड़ते आ रहे हैं फिर भी केन्द्र या राज्य सरकारें उन्हें उनका हक तो क्या, उनकी बात तक सुनने को तैयार नहीं.

किसान पर बीते दस माह से अबतक जो गुजरी है और इस राज में उसपर आने वाले दिनों में जो गुजरेगी उसे केवल किसान ही जानता है. किसानों ने मोदी सरकार के आगमन में एक उज्जवल भविष्य की किरण देखी थी. जिसके भरोसे उसने अपनी तीन फसलों में कर्ज लेकर भारी निवेश किया लेकिन सरकार ने उसकी फसलों को बाजार के हवाले करके किसान को बरबादी के कगार पर पहुंचा दिया.

एक फसल चौपट होने से बरबाद किसान को सामान्य होने में दो साल लगते हैं और यहां तो तीन फसलें लगातार हाथ से फिसल गयीं. ऐसे में कहां से वह पिछला कर्ज अदा करेगा और कहां से बच्चों की शिक्षा और शादी—विवाह का भार वहन करेगा. देश की यह सत्तर फीसदी आबादी आज बाजार की ओर जाने से कतराती है. यही हाल रहा तो बाजार और उद्योग दोनों ही थम जायेंगे.

देश की आर्थिक श्रंखला तबतक मजबूत है जबतक इसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गांव और किसान मजबूत है. जब किसान मरेगा तो व्यापारी और उद्योग भी सुरक्षित नहीं रहेंगे. सरकार को सबसे पहले कृषि और देहात की खुशहाली के लिए ईमानदार अर्थतंत्र विकसित करना होगा.

-जी.एस. चाहल.