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दम तोड़ रहा मूढ़ा उद्योग

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शासकीय उपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते और प्रदेश सरकार की अनदेखी के कारण गढ़ का मूढ़ा उद्योग दम तोड़ने की कगार पर खड़ा है। यहां का बना मूढ़ा भारत वर्ष ही नहीं विदेशों में भी बसे लोगों की बैठकों और कोठियों की शान बना हुआ है। यहां की मूढ़ा कारीगर रात-दिन मेहनत कर गंगा किनारे के खादर क्षेत्र से सरकंडा सेटा और सुतली को एकत्रित कर अपने-अपने घरों में नए-नए लुक देकर उसे तैयार करते हैं। 

गढ़ का बना मूढ़ा दिल्ली प्रगति मैदान में लगने वाले ट्रेड फेयर में दर्शकों को अत्यधिक भाता है। वहां एक प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। और वहां से लिए गए आर्डरों के आधार पर देश ही नहीं दुनिया के कई शहरों में सप्लाई किया जाता है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते अब यहां का मूढ़ा उद्योग दम तोड़ता नजर आ रहा है। 

मूढ़ा बनाने वाले कारीगरों को उसकी मजदूरी भी नहीं मिल पाती। जबकि प्रदेश सरकार के नुमाइंदों की माने तो गढ़ के बने मूढ़ों को एक बड़ा उद्योग घोषित कर इसे विश्व पटल पर लाने की कवायद छेड़ी गई थी, लेकिन यह उद्योग बढ़ने की बजाय कम होता दिखाई पड़ रहा है।

सन को लपेटकर बान तैयार कर गांव के लोग इन मूढ़ा बनाने वाले कारीगरों को बेचते हैं। बान और सेटों से मूढ़ा तैयार किया जाता है। यह सेटा गंगा नदी के किनारे पर विशाल मैदान के झाड़-झुंडों में स्वतः ही उपजता है, जिसे काटकर, सुखाकर तथा सेटे के ऊपर की पत्तियों को साफ कर यह मूढ़ा बनाने के काम आता है। धीरे-धीरे बान(रस्सी) कम बटने के कारण प्लास्टिक की बाननुमा बारीक रस्सी से मूढ़े की सिलाई की जाती है। जिसमें साईकिल के रिटायर टायर नीचे गोलाई में लगाकर नीचे से मूढ़े को मजबूती प्रदान की जाती है। यह कारीगर मूढ़ा ही नहीं छोटी मुढ़िया और बच्चों के छोटे—छोटे मूढ़े, सोफासेट, मेज आदि सजावटीनुमा तैयार किए जाते हैं।

हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल ने पूरे प्रदेश की ग्राम पंचायतों और न्याय पंचायतों पर गढ़ के बने मूढ़े और कुर्सी के सेट व मेज वहां पहुंचवाए थे, जहां से कई-कई ट्रक मूढ़ा तैयार कर ले जाया गया था, जहां आज चौपालों, पंचायतघरों, और न्याय पंचायतों में लोग उनपर बैठकर गौरवान्वित महसूस करते हैं।

यदि शासकीय अधिकारी और प्रदेश की सरकार तथा जनप्रतिनिधि जो मूढ़़ा उद्योग दम तोड़ रहा है इस तरफ ध्यान दें और उन्हें सेटा, बान आदि मुहैया कराया जाए तो यह उद्योग बड़े रुप में फल-फूल सकता है, लेकिन मूढ़ा कारीगर परिवार के लोग, जिसमें बच्चे व महिला भी शामिल हैं। वे सुबह से शाम तक मूढ़ा तैयार कर थोक व्यापारियों को बेचते हैं। उन्हें मनमाने ढंग से कीमत दी जाती है। यह व्यापारी ट्रकों में भरकर बाहर महंगे रेटों में मूढ़ा, कर्सी आदि सप्लाई करते हैं। व्यापारी दिनदूना रात चोगुनी तरक्की कर रहे हैं। वहीं मूढ़ा बनाने वाले मजदूर लाख मेहनत करने के बावजूद गरीबी रेखा से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं।

-नरेश शर्मा.