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मोदी सरकार की मंशा समझ गये गांव वाले

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सन 2013 में यूपीए सरकार द्वारा लाये गये भूमि अधिग्रहण बिल को रद्द करने के बाद नया भूमि अधिग्रहण बिल लाने के लिए केन्द्र सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्री तथा समर्थक मीडिया ग्रुप भी इस मुहिम में उनके साथ जुट गये हैं। मोदी सरकार इस किसान विरोधी बिल को किसान तथा देश हित का बिल घोषित करने में जुट गयी है तथा नितिन गडकरी ने तो यहां तक कह दिया है कि यह बिल हर हाल में पारित कराया जायेगा।

मोदी सरकार कुछ संशोधनों के साथ बिल को पास कराने को तैयार है, लेकिन सरकार की नीयत पर अब किसानों और विपक्षी दलों को भरोसा ही नहीं रह गया। सरकार ने जिस तरह नये बिल को पारित कराने का पहला मसौदा तैयार किया था, वह अंग्रेजी राज में बने बिल से भी खतरनाक था। उसमें किसानों को कोर्ट तक जाने का भी हक नहीं था। अंग्रेजी शासन में भी कोर्ट में जाने का हर मामले में अधिकार था।

मोदी सरकार का कहना है कि विपक्ष और किसान संगठन बिल में जो संशोधन चाहते हैं बतायें, बिल में सुधार किया जा सकता है, जबकि तमाम विपक्ष 2013 के बिल में किसी संशोधन को स्वीकार नहीं चाहता। किसान संगठन भी यही चाहते हैं। प्रधानमंत्री समेत भाजपा के तमाम नेता इस नये बिल की प्रशंसा करते नहीं थक रहे। साथ ही ऊलजलूल तर्क देकर उसे किसानों और गांवों के हित में ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार के ही समर्थक दल, शिवसेना और अकाली दल भी नये बिल के खिलाफ हैं। भाजपा के आनुषांगिक संगठन भी उसके खिलाफ हैं।

किसानों और खेतिहर मजदूरों में सरकार के खिलाफ बेहद रोष है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसीलिए सरकार मीडिया का भी सहयोग ले रही है। जो मीडिया किसानों के विरोध के साथ नये बिल के खिलाफ मुखर था, वह भी धीरे—धीरे सरकार की राह चल पड़ा है और सरकार के इस कदम का समर्थन करने लगा है। आखिर मोदी सरकार के आते ही अखबारों और टीवी चैनलों को धड़ाधड़ सरकारी विज्ञापन मिलने लगे हैं। उनके अच्छे दिन आ गये। किसानों और आम आदमी के बुरे दिनों से उन्हें कोई लेना—देना नहीं।

महाराष्ट्र में जहां भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार है, के विदर्भ में अचानक किसानों की मौत की संख्या में तेजी आयी है। जनवरी के बाद से इस इलाके में प्रतिदिन सात किसान मौत को गले लगा रहे हैं। केवल प्राकृतिक आपदाओं को ही इस के लिए दोष देकर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार उत्तरदायित्व से नहीं बच सकती। मोदी सरकार की एक-एक नीति किसान और गांव विरोधी होने के कारण यह सब हो रहा है।  

मोदी सरकार के आते ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में धान की फसल किसानों को आधे दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ा। गन्ने का पैसा अभी तक नहीं मिला। आलू की फसल के दाम नहीं मिल रहे। उधर नये भूमि अधिग्रहण बिल ने पहले से दुखी किसान का दिल तोड़कर रख दिया। गेहूं पर मौसम की मार के बाद किसानों को न तो बीमा योजना का लाभ मिला, न उचित मुआवजा और जनधन योजना में तो एक भी व्यक्ति को अभी तक बीमा लाभ नहीं मिला। जबकि इस योजना के ढोल पीट रहे हैं कि इसमें मुफ्त बीमा लाभ मिलना था।

हरिद्वार से बंगाल की खाड़ी तक गंगा नदी के दोनों ओर खेती करने वाले किसानों को सरकार ने नमामि गंगा योजना लागू कर खेती से वंचित कर और भी बरबाद किया है। इससे लाखों किसान परिवार बेरोजगार हो गये जो किसी तरह गरीबी में अपना पेट पाल रहे थे।

कितनी मजेदार बात है कि एक-एक कर किसानों को बरबाद करने का प्रयास हो रहा है और केन्द्र सरकार बार-बार किसानों की हिमायती होने का ढोल पीट रही है। किसान और गांव वाले अब मोदी मंडली की नीयत को भांप गये इसलिए उसके झांसे में नहीं आने वाले। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी हर बार लोगों को भ्रमित कर चुनावी लाभ नहीं ले सकती। जिन गांव वालों ने उन्हें सत्ता सौंपी थी, वे उसे वापस भी लेने की ताकत रखते हैं और ऐसा करने को मोदी सरकार ने जनता को मजबूर कर दिया है।

-जी.एस. चाहल.

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