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समरथ को नहीं दोष गुसाईं

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हाल ही में हमारे देश की आदलतों द्वारा तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और फिल्मी अभिनेता सलमान खान के मामलों पर जो फैसले आये हैं उनपर देश में न्याय प्रणाली पर सबसे अधिक चर्चा हुई। कई मंचों पर इन फैसलों पर प्रमुख बुद्धिजीवियों, कानूनविदों, सामाजिक कार्यकर्ता और नेताओं में बहस के दौर भी चले। इससे पहले अभिनेता संजय दत्त को सजा के दौरान जेल से कई बार छुट्टी दिया जाना भी बहस का मुद्दा बना था।

यह सभी जानते हैं कि उपरोक्त तीनों मामलों में पीड़ित वर्ग दोषारोपियों से कम ताकतवर थे। साथ ही आरोपियों की सत्ता शिखर तक पहुंच के साथ ही माली हालत शहंशाहों जैसी है। जे. जयललिता तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मौजूद थीं। दोनों बनावटी हीरो बेकसूरों की हत्याओं के आरोपी थे। जबकि अम्मा जयललिता पर आर्थिक आरोप था। संजय जेल में हैं, सलमान को अदालत ने जमानत दे दी जबकि अम्मा अदालत से निर्दोष बहाल हो गयीं।

अदालती फैसलों को गलत ठहराना या उसकी आलोचना कानून जुर्म है। इसलिए उन्हें मानना सभी की मजबूरी है। सर्वोच्च न्यायालय तक आप अपनी अपील का अधिकार जरुर रखते हैं। फिर भी यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि हमारे यहां अदालती प्रक्रिया बहुत महंगी है। उसके बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि मामला कितना लंबा खिंचेगा। सलमान खान का मामला ट्रायल कोर्ट तक 13साल चला जबकि उसे बेल मिलने में अदालत में कुछ भी समय नहीं लगा। एक अदालत से उसी दिन जेल और दूसरी अदालत से उसी दिन बेल। इस तरह के फैसलों से जनता में अदालती सिस्टम के प्रति क्या सकारात्मक संदेश जा सकता है?

धन-दौलत की अकड़ में गरीबों को कीड़े-मकौड़ों की तरह कुचल देने वालों को यह खुली रियायत नहीं तो और क्या है? गरीबों की कमाई को डकार कर उछलने-कूदने वालों को सत्ता का भी पूरा समर्थन हासिल है। रातों-रात कुबेर का खजाना समेट लेने वाली फिल्मों से सत्ता के शिखर तक पहुंची जय ललिता का काला धन भी सफेद हो गया। तुलसी दास ने ठीक ही कहा है —’समरथ को नहीं दोष गुसाईं।’

-जी.एस. चाहल.