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उधर बिलावल, इधर राहुल का प्राइमरी विद्यालय

उधर-बिलावल-इधर-राहुल-का-प्राइमरी-विद्यालय

बिलावल भुट्टो जब लंबे अरसे बाद अपने देश लौटे तो लोगों के जेहन में अनेक सवाल उभरे। पिछले साल पिता आसिफ अली जरदारी से उनके मनमुटाव की खबरें सामने आयीं। कहा गया कि बिलावल नाराज हैं। बाद में खबर यह आयी कि वे देश से बाहर चले गये हैं। यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ कि बिलावल पिता की किस बात से नाराज हुए थे। कयास जरुर लगाये गये कि राजनीतिक उठापटक और हैसीयत को लेकर बात बिगड़ी। यह भी कहा गया कि बेटा अपनी बात मनवाने को लेकर नाराज था।

भारत में सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी भी कुछ समय के लिए देश से बाहर चले गये थे। कहा गया कि वे ध्यान के मकसद से और मन की शांति के लिए गये हैं। यहां मनमुटाव की खबरें नहीं आयी। न ही राजनीतिक हैसीयत या अपनी बात मनवाने को लेकर कयास लगाये गये। यहां की आम जनता को राहुल गांधी के बारे में सही-सही पता नहीं लग पाया, मगर भाजपा आजतक उनके बाहर जाने के कार्यक्रम को लेकर बिना मतलब के बोल बैठती है। कभी-कभी लगता है जैसे उनके पास मुद्दों का अकाल पड़ गया हो।

विरासत का सवाल

भारत के राहुल गांधी और पाकिस्तान के बिलावल दोनों विरासत को आगे बढ़ाने में लगे हैं। यह कहने में कोई बुराई नहीं कि दोनों राजनीतिक तौर पर उतने परिपक्व नहीं हैं। जरदारी ने खुद कहा है कि बिलावल को राजनीतिक तौर पर परिपक्वता हासिल करने में समय लगेगा।

कई मौकों पर बिलावल राहुल पर भारी पड़ते दिखाई दे सकते हैं, लेकिन राहुल गांधी के पीछे काम करने वाली टीम स्थिति को संभालने में सक्षम है।

पीपीपी का भविष्य बहुत हद तक बिलावल भुट्टो पर निर्भर करता है। कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी पर टिका है। पार्टी की कमान को सोनिया गांधी जितने समय तक खींच सकती हैं, वे खींचेंगी, मगर एक दिन पूरा दारोमदार राहुल के कंधों पर आ सकता है। सोनिया की कोशिश यही रही है कि राहुल गांधी राजनीति के ‘प्राइमरी विद्यालय’ से किसी तरह बाहर आयें। वर्तमान में तो ऐसा होता नहीं दिख रहा।
 
बिलावल के पास समय हो सकता है या वे अपने तरीके से राजनीतिक तौर पर खुद को विकसित करने की क्षमता रखते हैं। वहां के राजनैतिक हालात भारत से बहुत जुदा हैं। वहां गठजोड़ की राजनीति भी अलग तरह की है।

सोनिया गांधी की छत्रछाया और टीम की शैडो में राहुल गांधी बोल रहे हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे उन्हें बेमतलब के यहां खींचा जा रहा है।

आखिर में यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस का बेड़ा पार लगाने के लिए राहुल गांधी पर दांव लगाना बेमानी है। उन्हें सीखने में लंबा समय लग सकता है।

-टाइम्स न्यूज़ ब्यूरो.