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गजरौला सरकारी अस्पताल की सेहत बद से बदतर

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चाहें स्वास्थ्य मंत्री हो अथवा बड़े से बड़े प्रशासनिक अधिकारी हो, वह नगर के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की सेहत सुधारने में सफल नहीं हो सके। सांसद और विधायक भी यहां के स्टाफ का कुछ नहीं बिगाड़ पाये। परिणामस्वरुप सीएचसी के तमाम चिकित्सक और अन्य कर्मचारी मनमानी से बाज नहीं आते।

गजरौला एक ऐसे स्थान पर स्थित है जहां राष्ट्रीय राजमार्ग और प्रांतीय राजमार्ग एक दूसरे को क्रास करते हैं। साथ ही कई छोटी सड़कें भी यहां आकर मिलती हैं। भारी-भरकम उद्योग लगे हैं। रेलवे जंक्शन है। ऐसे में ट्रैफिक का भारी दबाव रहता है। आयेदिन गंगा स्नान वालों की भीड़ भी रहती है। इन सभी वजहों से आयेदिन दुघर्टनायें होना आम बात है। चारों ओर दूर-दूर तक कोई अच्छा अस्पताल भी नहीं। इन सब कारणों से यह सरकारी अस्पताल बेहद महत्वपूर्ण है। जहां के समस्त स्टाफ को बहुत ही सतर्क तथा संवदेना पूर्ण ढंग से रहना चाहिए। शासन से उन्हें भारी भरकम वेतन और अन्य सुविधायें मिलती हैं। फिर भी अस्पताल के मुख्य चिकित्साधीक्षक अन्य चिकित्सक और उनका स्टाफ घोर लापरवाही से बाज नहीं आता। वे अपने दायित्वों का उचित निर्वहन नहीं करते।

गरीब मरीजों को यहां प्राथमिकता मिलनी चाहिए लेकिन साधान संपन्न और प्रभावशाली लोगों का ही ध्यान रखा जाता है। गरीबों की आम शिकायत रहती है कि उन्हें हड़काया जाता है और दवायें मुफ्त देने के बजाय बाजार से खरीदने को लिख दी जाती है। रैबीज के इंजेक्शन तक बेच दिये जाते हैं।

दुघर्टनाओं के गंभीर घायलों तक को समय से प्राथमिक उपचार तक नहीं मिलता। प्रायः तामीरदार चिकित्सकों को ढूंढते फिरते हैं। ऐसे में कई उन घायलों की मौत हो जाती है जिन्हें बचाया जा सकता था। लोगों को जीवनदान देने के लिए तैनात यहां के चिकित्सक एक प्रकार से मौत के सौदागर बनते जा रहे हैं। जेब गर्म होने के बाद ही घायलों या गंभीर मरीजों को देखते हैं। ये आरोप हमारे नहीं बल्कि यहां आने वाले मरीजों और घायलों द्वारा प्रायः लगाये जाते हैं।

मेरठ और मुरादाबाद के कई निजि चिकित्सकों से इनका कमीशन भी बताया जाता है। लोगों का कहना है कि उनके पास मरीज रैफर करने के बहाने इन्हें वहां से कमीशन मिलता है। मेरठ के कई चिकित्सक समय-समय पर अपने यहां घायलों और मरीजों को भिजवाने की गुहार करते देखे गये हैं। ऐसे में जिस मरीज की चिकित्सा यहां संभव भी है उसे भी बाहर रैफर कर दिया जाता है।

यहां के चिकित्सक तो मोटी फीस लेकर अपने सरकारी आवास पर मरीजों को देखते ही हैं बल्कि कई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी अपने आवासों पर मरीजों का झोलाछाप चिकित्सकों की तर्ज पर इलाज करते देखे जा सकते हैं।

इस सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की सफाई व्यवस्था का और भी बुरा हाल है। गंदे फ़र्श, गंदी दीवारें, बेतरतीब बैड और उनपर गंदी बैडशीट्स तथा चादरें मिलेंगी। अस्पताल में खून के धब्बे तथा अन्य गंदगी से सनी दीवारें देखी जा सकती हैं। किसी निरीक्षण की पहले से ही सूचना मिलने पर इन्हें बदलने की आवश्यकता महसूस की जाती है अन्यथा ये महीनों तक बिना धुले और सफाई के ही चलती रहती हैं।

जब से यह स्वास्थ्य केन्द्र बना है उसके बाद से लगातार इसकी सेहत बद से बदतर होती जा रही है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.