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विकास की राह में पत्थर

महात्मा-गांधी-की-विशाल-प्रतिमा

हमारे देश की आर्थिक बर्बादी के कई कारण लोग जानते हैं लेकिन यह हमारी बदकिस्मती कहें या लोगों की नासमझी कि देश गरीबी और धन की बर्बादी के एक ऐसा बड़ा कारक हमने पाल रखा है जिसे हम अपनी प्रगति और अस्मिता का जन्मदाता मानने का मिथक पाले बैठे हैं। यह मिथक हम सदियों से पाले बैठे हैं और उसे हकीकत मानकर आयेदिन उसी के सहारे इस देश और यहां की जनता के खून पसीने की कमाई लुटाते आ रहे हैं। धार्मिक रूढ़िवादिता उसमें हमारी सबसे बड़ी शत्रु है और देश की राजनीति लगातार उसके पोषण में बढ़ावा देती आ रही है।

पटना के गांधी मैदान में महात्मा गांधी की अब तक की सबसे विशाल प्रतिमा लगी है। इसकी कीमत दस करोड़ रूपये बताई जाती है। जो व्यक्ति जीते जी देश की दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण तन पर एक मामूली लंगोटी बांधकर मित्तव्ययिता का संदेश देता रहा है। उस व्यक्ति की मौत के बाद उसकी एक प्रतिमा पर सरकार ने दस करोड़ रूपये खर्च कर दिये।

देश भर में अकेले गांधी की हजारों मूर्तियां होंगी। यदि सारी मूर्तियों की लागत आंकी जाये तो अरबों रूपये बैठती है। अकेले गांधी को ही क्या कहे यहां तो जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी समेत नेहरू-गांधी परिवार की ही इतनी मूर्तियां हैं कि उनकी लागत का आकलन करना भी मुश्किल हो जायेगा।

कई सौ नेताओं की मौत के बाद एक-एक कर उनकी मूर्तियां लगाने की होड़ मचती गयी और हालत यहां तक आ पहुंची कि बसपा सुप्रीमों मायावती ने अपने जीवित रहते ही जनता का करोड़ों रूपया अपनी मूर्तियों के निर्माण पर ही खर्च कर दिया।

हो सकता है आने वाले दिनों में बहुत से नेता अपने गर्भ में पल रहे शिशुओं का अल्ट्रासाउन्ड कराकर उनके जन्म लेने से पहले ही मूर्तियां बनाने लगें। वैसे भी देश में खानदानी राजनीति का रिवाज हो चुका है नेताओं की सभी मूर्तियों की लागत का अनुमान देश की जीडीपी से अधिक है।

यह तो बात नेताओं की मूर्तियों की हुई। यहां तो आदिकाल से देवी देवताओं और तथा कथित भगवानों तथा धार्मिक महापुरूषों की मूर्तियों का रिवाज रहा है और कम होने के बजाय तेजी से बढ़ रहा है। विशाल धर्म स्थलों से लेकर सड़कों के किनारे अवैध रूप से अधिकृत स्थानों तक पर लोग मूर्तियां लगाये बैठे हैं। धार्मिक महापुरूषों की मूर्तियों की न तो संख्या का आकलन किसी के पास है और न ही किसी ने इनके मूल्य का अनुमान लगाया है।

अकेले उत्तर प्रदेश में एक करोड़ इस तरह की प्रतिमायें हैं जिनका मूल्य राज्य की दस वर्षों की जीडीपी से भी अधिक है। पूरे देश में कितनी देव प्रतिमायें होंगी और उनका अनुमानित मूल्य क्या होगा इसी को सोचकर माथा ठनकता है।

यह स्थिति और भी भयावह होती जा रही है। प्रति वर्ष कोई न कोई नेता या चर्चित व्यक्तित्व हाड मांस का शरीर त्यागता है और उसके समर्थक उसकी प्रतिमा स्थापित करने का काम करते हैं। यही नहीं मूर्तियों की स्थापना का क्रम जारी रखते है।

कई स्थानों पर इसी बात पर झगड़े और खून खराबे हो जाते हैं कि यहां किसकी मूर्ति लगे। कई लोग एक ही स्थान पर अपने अपने नेता या देवी-देवता की मूर्ति लगाने का प्रयास करते हैं।

कई ऐसे लोगों की प्रतिमायें भी लगायी जाने लगी हैं जो जीवन भर मूर्ति और मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी रहे हैं। इसमें सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह का है। चौधरी आर्यसमाजी थे और वे मूर्तिवाद के सख्त विरोधी थे। लोगों ने उनके देहान्त के बाद उनकी भी बहुत सी मूर्तियां लगा दी हैं। साथ ही उनपर वाकयदा माल्यार्पण कर लोग एक तरह की पूजा ही करने लगे हैं।

जहां प्रतिमाओं के निर्माण और स्थापना में ही भारी रकम खर्च होती है वहीं जब तक ये स्थापित रहेगी इनके रख रखाव और सुरक्षा पर भी भारी भरकम राशि का क्रय होता रहेगा। देशभर में आम आदमी की सुरक्षा जहाँ रामभरोसे है वही इन बुतों की सुरक्षा में न जाने कितने कर्मचारी और अधिकारी लगाये गये हैं। इससे भी सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। जीवित रहते नेताओं की रखवाली करनी ही पड़ती है लेकिन ये मरने के बाद हमें बुतों के रूप में भी रखाने पड़ते हैं।

यही नहीं किसी शरारती तत्व द्वारा मौका मिलने पर इन मूर्तियों में तोड़फोड़ भी कर दी जाती है उससे हमारी कानून व्यवस्था खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है। बल्कि कई बार बहुत से स्थानों पर दंगे और बवाल हो जाते हैं जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। कई मोकापरस्त स्वार्थी नेता जानबूझकर भी इस तरह के कान्ड करकर  राजनैतिक लाभ उठाने का कुत्सित प्रयास करने से भी नहीं चूकते। जिससे अनेक लोगों और असीमित सम्पत्ति को क्षति पहुंचती हैं।

देश में समय समय पर मूर्ति पूजा से असहमत होने वाले महापुरुष, समाजसुधारक और नेताओं ने मूर्तिवाद के खिलाफ आवाज बुलन्द की है और उनके तर्कों से सहमत होने वालों की भारी तादाद है फिर भी देश में मूर्ति स्थापना और मूर्तिपूजा का प्रचलन घटने की बजाय बढ़ा ही है।

गुरू नानक, कबीरदास, संत रिवदास, जयदेव,  सन्त नामदेव, समेत मध्यकाल में अनेक सन्त महापुरूषों ने मूर्ति पूजा का जमकर खंडन किया।

आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने हरिद्वार में कुम्भ के दौरान इस प्रथा को वेद विपरीत बताया। इसके विपरीत आज कुम्भ में ही करोडों शिवलिंग बनाये जा रहे हैं। गणेश प्रतिमा विसर्जन कर नदियों का जल वही लोग प्रदूषित कर रहे हैं जो गंगा के प्रदूषण पर आंसू बहाते हैं।

शिरडी के साई बाबा जीवन भर कटोरा लेकर भीख मांगते रहे। उनके जीते जी शिरडी के दिया जलाने केा तेल तक नहीं दिया। जबकि उनकी करोडों की प्रतिमायें उनके प्राणान्त के बाद बना दी गयी और इन जड़ प्रतिमाओं पर करोड़ों रूपयों के स्वर्णमुकुट और हार सजाये जा रहे हैं।

दूसरी और देश की एक बड़ी आबादी आज भी अभावग्रस्त जीवन में भूख और दरिद्रता का नारकीय जीवन जीने को मजबूर है बिल्कुल जड़ और निर्जीव प्रतिमाओं पर देश के धन का सबसे बड़ा भाग पानी की तरह बहाया जा रहा है जबकि जीवित मूर्ति के रूप में मौजूद हमारे देश की आबादी का एक हिस्सा जीवन की आम जरूरतों का मोहताज है। यदि मूर्तियों पर बर्बाद किये जा रहे विशाल धन का एक भाग हम गरीब जनता पर ईमानदारी से खर्च करें तो यहां कोई भी गरीब नहीं रहेगा।

क्या मूर्ति पूजक मानव निर्मित निर्जीव प्रतिमाओं के बजाय ईश्वर निर्मित जीवित मूर्ति मानव सेवा को प्राथमिकता देने का साहस जुटायेंगे?

-जी. एस. चाहल