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नास्तिकों को आस्तिकों से अधिक लाभकारी है योग

नास्तिकों को आस्तिकों से अधिक लाभकारी है योग

योग दिवस मनाने को लेकर अकारण विवाद फैलाने का प्रयास हो रहा है। दरअसल कई लोगों को कुछ मुद्दों को अनावश्यक रुप से चरचाओं में लाकर प्रकाश में बने रहने की आदत बन चुकी है। न तो यह समर्थन का मामला है और न ही विरोध का।

वास्तव में यह एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसके सहारे तन और मन दोनों संतुलित रुप से काम करने लगते हैं जिससे शरीर और मस्तिष्क दोनों ही स्वस्थ्य रहते हैं। बीमारियों से लड़ने की शरीर में अद्भुत शक्ति उत्पन्न हो जाती है। दिल और दिमाग को एकाकार होकर कार्य करने योग्य बनाने के कारण इसे योग का नाम दिया गया है।

भले ही योग एक पुरातन भारतीय स्वास्थ्य पद्धति है और हमारे देश में इसे लगातार अपनाया जा रहा है लेकिन आज भी भौतिकवादी और असंतुलित भागदौड़ की अशांत दुनिया में इसकी और भी अधिक आवश्यकता है। यह कहना भी युक्ति संगत है कि योगाचार्य रामदेव ने योग की महत्ता और उसके लाभ के लिए जो प्रयास किये हैं वैसे किसी अन्य ऋषि मुनि या सन्यासी ने नहीं किये। उन्होंने इसके लाभ और गुणों के लिए अपनी किशोर और युवा अवस्था को समर्पित कर दिया है। योग मानव जीवन के स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता के लिए एक बेहद सुलभ और अनिवार्य व्यवस्था है।

जो लोग योग को किसी धर्म विशेष के हित में और किसी धर्म विशेष के खिलाफ मान रहे हैं वे योग के बारे में या तो जानते नहीं अथवा वे जानबूझकर उसके विरोध में हैं। वास्तव में योग ही एक ऐसी पद्धति है जो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ हमारे मन-मस्तिष्क को इतना उज्जवल कर देती है कि हम अध्यात्म की ओर स्वस्फूर्त हो उठते हैं।

मैं दस वर्ष की आयु से योग का अभ्यस्त रहा हूं। आज भी आसन अनवरत कर रहा हूं। रामदेव तो बहुत बाद में यहां तक आये हैं, लेकिन उन्होंने इसे अपने त्याग और तपस्या से जन जन तक पहुंचाया है। इसलिए वे बधाई के योग्य हैं।

मेरा मानना है कि योग न तो किसी की बपौती है और न ही इसका कोई ठेकेदार हो सकता है। आज दुनियाभर में लोग योग को जीवन में उतार रहे हैं। यह और भी अच्छा है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत हुई है। लेकिन इसे धार्मिक या साम्प्रदायिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। यह न तो धार्मिक है और न ही साम्प्रदायिक। यह विशुद्ध सर्वहितकारी है।

कुछ लोगों को योग के दौरान तंत्र-मंत्र बोलने की आदत है तथा कुछ लोग यह नहीं चाहते। मैं इसे लगातार साढ़े चार दशक से कर रहा हूं। योग में मुंह बिल्कुल बंद रखना पड़ता है। कुछ भी बोलना नहीं चाहिए। मुंह बंद कर नाक से ही सांस लिया जाता है। पूजा पद्धति से इसका कोई लेना देना नहीं। इसे नास्तिक भी कर सकते हैं। वे मेरे साथ आयें उन्हें भी उतना ही लाभ देगा जितना आस्तिकों को।

-जी.एस. चाहल.