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जाट विरोधी है भारत की राजनीति

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जाटों की देशभक्ति और बहादुरी से इतिहास भरा पड़ा है। जाटों ने फिर भी अपना महिमामंडन नहीं किया, अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने में भी वे दूसरों से आगे रहे हैं। जाट वीरों के बलिदान की लंबी सूची है। आज भी देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने तथा सीमा की रक्षा करने वालों में उसका योगदान सबसे आगे है। वैसे सभी क्षेत्रों में आजकल यह जाति बढ़चढ़ कर कुशलता के साथ देश सेवा में देश के दूसरे वर्गों के लोगों के साथ प्रेम तथा सौहार्द के साथ कार्य कर रही है। पहले यह वर्ग मुख्यतः कृषि पर निर्भर रहकर ग्रामीण परिवेश तक सीमित था। देश सेवा की वंश परंपराओं के चलते सेना में नौकरी गर्व का विषय माना जाता रहा है। पिछले कुछ दशकों से सीमित होती कृषि भूमि और संसाधनों की कमी के चलते जाट भी शहरों की ओर उन्मुख हुए। जिसमें दुकानदारी, व्यापार, राजनीति तथा दूसरे व्यवसायों में भी इस वर्ग के लोगों ने हाथ आजमाने शुरु कर दिये।

मैंने भी 1975 में मंडी धनौरा में कृषि यंत्रों की दुकान शुरु की थी, जिसके पीछे परिवार बढ़ने पर खेती में गुजारा नहीं होना था। इस दौर में न जाने कितने जाट नवयुवक कृषि के साथ व्यापार या अन्य कारोबारों में भी जुड़ गये। हरियाणा और पंजाब में यह स्थिति इससे डेढ़ दशक पूर्व शुरु हो चुकी थी।

गांवों से इस दौरान केवल जाट ही इन व्यवसायों के लिए शहरों की ओर आने शुरु नहीं हुए बल्कि उन सभी वर्गों के लोग जो जाट बाहुल्य इलाकों में खेती से जुड़े थे वे भी उन्हीं की तरह उनके जैसे कामों से जुड़ गये या जाटों के पास नौकरी करने लगे। इस दौरान जाट और गूजर, जो कई तरह से व्यवहार, रहन-सहन तथा शक्ल-सूरत में भी मेल खाते हैं प्रोपर्टी—डीलर तथा राजनैतिक क्षेत्र में किस्मत आजमाने को आगे बढ़े। उन्हें सफलता भी मिली। इससे सदियों से व्यापार, दुकानदारी, राजनीति, ठेकेदारी आदि पर कब्जा जमाये बैठे उस परंपरागत वर्ग को खतरा महसूस होने लगा जो इसपर अपना पुश्तैनी हक मानते थे। राजनीति में जहां कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के जाटों के कुछ महारथियों को अपने साथ साधने में सफलता भी पायी, वहीं कई जाट उनसे सामंजस्य बिठाने में असहज रहने के कारण दूर रहे। इनमें हरियाणा के देवीलाल, पंजाब के स. प्रकाश सिंह बादल, तथा उत्तर प्रदेश में चौ. चरण सिंह जैसे दिग्गज प्रमुख थे।

पंजाब में जाटों के खिलाफ कांग्रेस ने ज्ञानी जैल सिंह को तथा हरियाणा में भजनलाल को नेतृत्व सौंपा। कुछ समय ये सफल भी रहे परंतु बाद में दोनों जगह उसे जाटों को ही कमान सौंपनी पड़ी। अब हरियाणा में मोदी गैर जाट खट्टर को लाकर उसी राह पर चल पड़े हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के परिणामों से समझ लिया कि जाट बाहुल्य क्षेत्रों में भाजपा को आसानी से भारी सफलता मिल गयी। बंगाल जैसे हिन्दू बाहुल्य लेकिन जाट शून्य राज्य में वे धराशायी रहे। देश के गैर जाट भागों में उन्हें सफलता नहीं मिली या बहुत कम मिली। वे समझ रहे हैं कि जाटों के पास एक बड़ी एकजुट ताकत है। यदि सत्ता और सरकारी नौकरियों में इनकी भागीदारी मजबूत हो गयी और यह वर्ग किसी एक जाट नेता के झंडे के नीचे एकजुट हो गया तो सत्ता इनके हाथ में आ सकती है। इसलिए इनकी ताकत को कम करना जरुरी है। हो सकता है इसी कारण मोदी सरकार ने जाटों को कमजोर करने के लिए कई हथकंडे अपनाये जिनमें कृषि भूमि और कृषि को कमजोर करना, आरक्षण न दिलाना, तथा किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री जाट न बनने देना शामिल है। यह मोदी सरकार के उदय के फौरन बाद हुआ है। किसानेां की उपेक्षा के पीछे भी जाटों को ही कमजोर करने का मकसद है।

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मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूं कि गांवों से शहरों में पहुंचे जाट युवकों द्वारा व्यापार, दुकानदारी, ठेकेदारी, राजनीति तथा दूसरे व्यवसाय करने से इन कामों को करने वाले पुश्तैनी वर्गों में बेचैनी फैलने लगी थी। वे जाटों के प्रति थोड़ा अलगाव सा रखते हैं। यही कारण है कि जाट आरक्षण के नाम पर यही लोग विरोध करने लगते हैं। जबकि कई दूसरे वर्गों के आरक्षण पर उंगली नहीं उठाई जाती।

जाट आरक्षण नहीं चाहते थे, लेकिन जब सरकारी नौकरियों में उनके लिए दरवाजे बंद होने शुरु हो गये,राजनीति में भी उन्हें अलग-थलग करने का प्रयास किया जाने लगा तो इसके अलावा कोई रास्ता नहीं। यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। इसे केन्द्र सरकार हल्के में न ले।

दिल्ली चारों ओर जाट बाहुल्य इलाकों से घिरी है तथा दिल्ली में भी जाट काफी हैं। यदि जाटों के साथ अन्याय और भेदभाव जारी रहा और उन्हें बहकाने का प्रयास किया गया तो जाट देश की राजधानी में बैठे शासकों को अपनी शक्ति का अहसास कराने से पीछे नहीं हटेंगे।

यह समय ही मांग है, इसी में देश हित है।

पिछले विधानसभा चुनाव में सभी दलों ने जाटों के साथ जो भेदभाव किया उसका सबसे ज्वलंत उदाहरण अमरोहा जिला है। जहां जाट तीन सबसे अधिक संख्याबल वाले वोट बैंक में से एक है। कितनी मजेदार बात है कि यहां से किसी भी राजनैतिक दल ने पिछले चुनावों में किसी भी जाट को यहां से चुनाव जीतने योग्य नहीं समझा।

यहां चार विधानसभा सीट हैं। एक एस.सी. आरक्षित होने के बाद तीन सीटें बचती हैं जहां जाटों की अच्छी तादाद है। यहां किसी ने भी जाट को टिकट नहीं दिया। जाटों से बहुत कम आबादी वाले खड़गवंशी भी उनसे ठीक रहे उन्हें भाजपा तथा बसपा ने अपना उम्मीदवार बनाया।

यशपाल मलिक जाट आरक्षण को बचाये रखने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन जबतक जाट गुटबंदी खत्म कर एक मंच पर नहीं आयेंगे उन्हें कामयाबी नहीं मिलेगी।

चौ. देवीलाल और चौ. महेन्द्र सिंह टिकैत के मतभेदों ने जाट हितों को चोट पहुंचाई। आज भाकियू और जाट आरक्षण आंदोलन चलाने वाले दोनों गुट अलग-अलग हैं तथा एक ही साथ अपना-अपना आंदोलन शुरु करते हैं। दोनों का ही केन्द्र अमरोहा होता है। ये दोनों जबतक एकजुट नहीं होंगे सफलता संदिग्ध है।

एकजुट न भी हों तो कम से कम आंदोलन एक साथ न चलायें, दोनों के समर्थक एक ही हैं। वे कहां-कहां जायें? पूरे उत्तर प्रदेश के जाटों की एकजुटता इस आंदोलन को लक्ष्य हासिल करा सकती है।

-जी.एस. चाहल.

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