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नागपाल के सहारे हिन्दू-मुस्लिम समीकरण साधने का प्रयास

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आगामी विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनावों जैसी शर्मनाक हार की पुनरावृत्ति को रोकने, जिले में एक ही वर्ग की तरफ राजनैतिक झुकाव होने का पाप धोने तथा हर हाल में जिले की सभी विधानसभा सीटों पर कब्जा बरकरार रखने के लिए समाजवादी पार्टी के राज्य स्तरीय शीर्ष नेतृत्व ने एक रणनीति तय कर ली है जिसकी पैंतरेबाजी जिला पंचायत से शुरु होने जा रही है। लखनऊ से मिली जानकारी के मुताबिक शिवपाल यादव को यहां का दायित्व भी सौंप दिया गया है। जिले के दो बड़े नेताओं के बीच की गुटबाजी को इससे कम होने में भी मदद मिलने का नेतृत्व को भरोसा है।

जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए सपा के दो कद्दावर नेताओं में अभी से खींचतान थी। इनमें कैबीनेट मंत्री महबूब अली अपने बेटे या पत्नि के पक्ष में हैं जबकि राज्यमंत्री कमाल अख्तर अपनी पत्नि को इस कुरसी पर देखना चाहते हैं।

उधर राजनैतिक दौड़ से धक्का देकर बाहर किये गये चौ. चन्द्रपाल सिंह भी उसी उम्मीद को पाले बैठे हैं, जिसे स्वीकार नहीं किया जा रहा। वे ससम्मान गुजारे लंबे राजनैतिक जीवन को उम्र के अंतिम पड़ाव पर पता नहीं क्यों मिट्टी में मिलवाने पर तुले हैं?

महबूब अली और कमाल अख्तर के अपने-अपने मजबूत तर्क हैं जिनके सहारे वे जिला पंचायत पर अपना-अपना दावा पेश करना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव हारने के बाद कमाल अख्तर का राजनैतिक रुतबा जनपद में महबूब अली के मुकाबले घटा है यह सभी जानते हैं। यदि उन्हें जिला पंचायत भी मिल गयी तो फिर यहां महबूब अली बढ़ेंगे और कमाल अख्तर का 'कमाल’ उतना नहीं रह पायेगा। वैसे 'नेताजी’ के दरबार में कमाल अख्तर की साख आज भी उत्तर प्रदेश के किसी भी बड़े नेता से कम नहीं।

पूरे जिले में यह धारणा है कि सपा के तीन मंत्री और एक विधायक एक ही समुदाय के होने के कारण दूसरे समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव हो रहा है। प्रशासन पर दबाव बनाकर काम कराया जाता है। लोकसभा के चुनाव में यही वजह रही कि कमाल अख्तर जैसे स्थानीय, मिलनसार तथा शांतिप्रिय नेता को एक बाहरी तथा अनजान व्यक्ति से हार माननी पड़ी। यह धारणा अभी कायम है। क्योंकि जिले में सपा ने सभी महत्वपूर्ण पद एक वर्ग विशेष को थोक में दे रखे हैं।

सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक उपरोक्त समस्याओं का समाधान कर लिया गया है जिसका पहला चरण जिला पंचायत चुनावों से शुरु होने जा रहा है। सपा में यह लगभग तय है कि इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी में हिन्दू का नाम आगे कर यह संदेश दिया जायेगा कि जनपद में पार्टी हिन्दू-मुस्लिम दोनों को साथ लेकर चलेगी।

पता चला है कि पूर्व सांसद देवेन्द्र नागपाल को इसीलिए जिला पंचायत के चुनावी दंगल में लाया जा रहा है। सपा को उम्मीद है कि सपा से दूरी बना रहे नागपाल समर्थक सपा से जुड़ेंगे, जिससे सपा मजबूत होगी, उसपर लगा एक वर्ग विशेष का ठप्पा हटेगा, जिला पंचायत चुनाव के साथ विधान सभा चुनाव में भी पार्टी को इसका लाभ मिलेगा।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि पार्टी के दो बड़े नेताओं में जिला पंचायत की कुरसी को लेकर बढ़ रही अंतर्कलह इससे यदि बिल्कुल समाप्त भी नहीं हुई तो उसे कम करने में मदद जरुर मिलेगी।

यदि सपा जिला पंचायत में बहुमत प्राप्त कर नागपाल को अध्यक्ष बनवाने में सफल हो जाती है, तो देवेन्द्र नागपाल तथा उनके समर्थक, जो पहले सभी विधानसभा चुनावों में सपा विरोधी रहे हैं, इसके बाद जिले की चारों विधानसभा सीटों पर जोरशोर से सपा उम्मीदवारों के साथ होंगे। जिसका लाभ उसे मिलना स्वाभाविक है। लेकिन सबसे दिलचस्प यही है कि ऐसे अधिकांश लोग आज भी सपा के ही सबसे बड़े विरोधी हैं। सवाल है -क्या नागपाल उन्हें सपा के लिए राजी करने में सफल हो पायेंगे?

उधर नागपाल समर्थकों का कहना है कि उन्होंने वार्ड दस से अपने नेता का चुनाव प्रचार भी शुरु कर दिया है। वे सपा की मजबूती के लिए अभियान में जुट गये हैं जिसके बेहतर परिणाम मिलने शुरु हो गये हैं। सपा की यह चुनावी रणनीति सुनने और देखने में तो अच्छी लग रही है लेकिन इसकी असली परीक्षा आने वाले दिनों में होगी।

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-जी.एस. चाहल.

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