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किसानों के गन्ने की लूट की तैयारी, सरकार मौन

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मिल मालिकों ने सरकार को स्पष्ट बता दिया है कि यदि चीनी के भाव नहीं बढ़े तो वे आगामी सत्र में गन्ना 170 से अधिक मूल्य पर नहीं खरीद पायेंगे। चीनी से भरे गोदामों और खपत के हालात को देखते हुए चीनी के भाव बढ़ने की बिल्कुल संभावना नहीं। इसलिए यह तय मान लें कि गन्ना उत्पादकों और उनके आश्रितों के लिए आने वाले दिन और भी बुरे सिद्ध होने जा रहे हैं। बीते दो सालों से गन्ने के भाव ज्यों के त्यों ही हैं बल्कि गत वर्ष के गन्ने के चालीस रुपये काटकर भुगतान किया जा रहा है। वह भी सारा भुगतान नहीं किया गया।

जब से केन्द्र में राजग सरकार आयी है तब से किसानों को भुगतान के नाम पर मिलों को राज्य और केन्द्र दोनों सरकारों ने कई सौ करोड़ के राहत पैकेज दे दिये परंतु मिलों ने किसानों के गन्ने का भुगतान नहीं किया।

राज्य सरकार मिलों पर सख्ती करने के बजाय उनके साथ रियायत बरत रही है। दोनों ही सरकारें किसानों से झूठी हमदर्दी दिखाकर पैसा मिलों को दिये जा रही हैं। यही कारण है कि मिल मालिकों ने नवंबर से शुरु होने वाले पेराई सत्र के लिए अधिकतम 170 रुपये गन्ना मूल्य की मांग रख दी है साथ ही ऐसा न होने पर मिलें नहीं चलाने की चेतावनी भी दी है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार गन्ने का हाल गत वर्ष से भी बदतर होने जा रहा है। जब मिलें 170 पर लेंगी तो क्रेशर और कोल्हू सौ से ऊपर नहीं जायेंगे। ऐसे में छोटे और सीमांत किसानों का बहुत बुरा हाल होने वाला है जबकि बड़े किसान बड़े घाटे में जायेंगे।

मिल चलने में तीन माह तथा क्रेशर दो माह बाद शुरु हो जायेंगे। सरकार के सामने मिल मालिक सबकुछ बयां कर चुके, ऐसे में सरकार को सबकुछ पता है बल्कि कहना चाहिए केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों को। फिर भी किसानों की हमदर्द सरकारें खामोश हैं।

मोदी जी का वही राग दरबारी फिर जारी है, वे अपने मन की कहने में मस्त हैं। किसानों के मन में क्या है या देशवासी क्या कहना चाहते हैं, इससे उन्हें कुछ नहीं लेना देना।

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गन्ना, कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में उत्तर भारत का सबसे अधिक रोजगार देने का साधन है, फिर भी सरकार उसे गंभीरता से नहीं ले रही। सरकार की गन्ना नीति ही नहीं, लगता है उसे इससे कोई सरोकार ही नहीं।

गत सीजन में गन्ने की मार का मारा किसान अभी तक नहीं संभला, उसने इस बार गन्ना कम बोया है और फसल भी अच्छी नहीं है। इसके बाद जो कुछ है उसका भी वाजिब दाम नहीं मिलेगा तो उसका हाल बेहाल होना तय है।

भोला किसान 350 रुपये गन्ना मूल्य की मांग कर रहा है। कई जगह भाकियू जैसे कई किसान संगठन उसे बैठक कर आंदोलन को प्रेरित भी कर रहे हैं। परंतु मिल वालों और सरकारों की सांठगांठ के बीच हुए गठजोड़ के कारण जब सीजन में उसके गन्ने के गतवर्ष से भी बहुत कम दाम मिलेंगे तब हकीकत का पता चलेगा। सरकार को त्वरित समाधान निकालना होगा। अन्यथा गत वर्ष से भी अधिक किसान इस बार आत्महत्याओं को मजबूर होंगे। मोदी जी आपके मन की बात सुनते-सुनते थक चुके अब कुछ काम की बात भी कर लो।

-जी.एस. चाहल.

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