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उत्तर प्रदेश में सत्ता के सौदागरों से मुक्ति की छटपटाहट

politics in uttar pradesh

आजाद भारत में देश की जनता को वोट के जरिये सरकार बनाने और बदलने की शक्ति मिली। जनता इस शक्ति का समय आने पर बार-बार प्रयोग भी करती आ रही है। जनता ने इस हथियार से सत्ता पर कब्जा किये दलों और बड़े-बड़े महारथियों को धूल चटायी। लेकिन देखने में यही आया कि जब भी नाराज जनता ने किसी सरकार से नाराजगी जाहिर की तो उसने यह नहीं देखा कि जिसे वह सत्ता से बेदखल कर रही है उसके बाद उसका वारिस कैसा सिद्ध होगा?

ज्यादातर चुनावों में हमारे देश के लोग सत्ता में बैठे लोगों को हराने के लिए मतदान में भाग लेते हैं। ऐसे में यह भी नहीं देखते कि इसके विकल्प में कैसी सरकार आयेगी? परेशान जनता ने बार-बार सत्ताधीश बदलकर देख लिए लेकिन उसकी कसौटी पर कोई भी सरकार खरी नहीं उतरी।

उत्तर प्रदेश आबादी में देश का सबसे विशाल राज्य है। यहां से देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को विदा हुए कई दशक बीत चुके। सपा और बसपा इस दौरान चार-चार बार सत्ता में रह चुकीं। इन दोनों दलों ने तीन-तीन बार मिलीजुली तथा एक-एक बार पूर्ण बहुमत की सरकारें बनायीं। जो सूबा देश का सबसे अग्रणी सूबा होना चाहिए था वह विकास में लगातार पिछड़ता ही गया। हालत यहां तक खराब है कि भ्रष्टाचार में यह राज्य बिहार को भी मात दे रहा है। बसपा तथा सपा दोनों ही सरकारों में भ्रष्ट अधिकारियों को प्रश्रय दिया जाता रहा है। यादव सिंह जैसे कई महाभ्रष्ट अधिकारी दोनों दलों की सरकार के प्रिय पात्र रहे हैं। आज भी कई नाम ऐसे हैं जिनपर घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्तता के दाग हैं लेकिन सपा सरकार में ऐसे अफसरों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है। कई को पदोन्नति देकर भी पुरस्कृत किया जाता रहा है। खुलेआम नाम उजागर होने के बावजूद, बेशर्मी की सारी हदें लांघकर युवा मुख्यमंत्री ऐसे लोगों के सहारे सरकार चला रहे हैं। मुख्यमंत्री के पिता और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की जनता को नामसझ मानकर मुख्यमंत्री की सराहना करते हैं तथा मंत्रीमंडल के अन्य सहयोगियों को सुधरने की नसीहत देते हुए देखे जाते हैं।

बहुजन समाज पार्टी की सरकार को पलटते समय राज्य की जनता केवल बसपा को हराना चाहती थी लेकिन उसने यह ध्यान नहीं दिया कि इसके विकल्प में वही पार्टी सत्ता में आने वाली है जिसकी नीतियों के खिलाफ वह बसपा को सत्ता में लायी थी।

बीते लोकसभा चुनाव में राज्य के लोगों ने दोनों को नकार कर भाजपा का दामन ऐसा थामा कि बाकी सभी दलों का सूपड़ा साफ कर दिया। अब उसके परिणाम एक साल में आने पर ही लोगों का उससे मोह भंग हो चुका।

राज्य की जनता ऐसे ही नेतृत्व की तलाश में बार-बार सरकार बदलती है लेकिन उसे हर बार पहले से भी गयी गुजरी हालत का सामना करना पड़ता है.

जनता परेशान है। वह कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा सभी को आजमा चुकी। इस दौरान राज्य में बेरोजगारी और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव को सबसे अधिक चोट पहुंची है। अलग-अलग सम्प्रदायों के दो लोगों के बीच मामूली विवाद पर भी साम्प्रदायिक दंगों का खतरा रहता है। राज्य में शहरों के साथ-साथ ग्रामांचलों में भी यह आग विकराल होती जा रही है। चुनावी मौके पर अधिकांश नेता जातीय आधार पर जीत-हार का गणित भिड़ाते हैं। ऐसे में सौहार्दपूर्ण माहौल में भी खटास होने का खतरा पैदा हो जाता है।

कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्र राज्य के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले हैं लेकिन कृषि सबसे उपेक्षित होती जा रही है और औद्योगिक विस्तार को तबतक वांछित आकार नहीं दिया जा सकता जबतक राज्य की कानून व्यवस्था, यहां प्रेम और सौहार्द का वातावरण बनाने में सफल नहीं होती।

दिल्ली से सौ किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-24 पर स्थित गजरौला को तीन दशक पूर्व औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया गया। यहां कई बड़े व मध्य बजट की फैक्ट्रियां लगीं। यहां क्षेत्रीय नेताओं का बराबर हस्तक्षेप रहता है। ठेकेदारी हासिल करने को हर तरह का दबाव बनाया जाता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार अलग है। ऐसे में यहां अधिकांश उद्योग बंद हो गये।

पूर्वी उत्तर प्रदेश की हालत और भी बदतर है। वहां राजनैतिक हस्तक्षेप और गुंडागर्दी ज्यादा है। कई अन्य कारण भी हैं जिनके कारण यहां उघोग लगाने को आसानी से कोई तैयार नहीं होता। यदि राज्य में ईमानदार तथा सर्वसमावेशी प्रगतिशील बौद्धिक क्षमतावाली सरकार आये तो कृषि तथा औघोगिक विकास में यह राज्य देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरेगा। परंतु सवाल यही है कि ऐसा नेतृत्व लाया कहां से जाये?

राज्य की जनता ऐसे ही नेतृत्व की तलाश में बार-बार सरकार बदलती है लेकिन उसे हर बार पहले से भी गयी गुजरी हालत का सामना करना पड़ता है।

जनता इस बार भी राज्य की मौजूदा सरकार के कामकाज से नाराज है। वह उसे बदलने का मन बना चुकी है। यदि इस बार भी उसने केवल सत्ताधीशों को हराने के लिए ही वोट दिये और यह नहीं सोचा कि इसका विकल्प क्या होगा तो कोई लाभ नहीं होने वाला। इस बार दोनों बातों पर गंभीरता पर सोचकर फैसला लिया जाये तो बेहतर होगा।

-जी.एस. चाहल.

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