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संगठित किसानों के मन की बात ही सुनती हैं सरकारें

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चंद बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने, आम आदमी की अपेक्षाओं को नजरअंदाज करने, बिना किसी ठोस नीति के विदेशी यात्राओं की झड़ी लगाने तथा बिना किसी उपलब्धि को हासिल किये अपनी तारीफ के ढोल पिटवाने और पहले से ही जनता के धन पर एशो-आराम का जीवन जीने वाले फिल्मी कलाकारों को पुरस्कृत कर अपना प्रचार करवाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'मन की बात’ जनता ताड़ गयी है। वह अब उनके द्वारा दिये किसी भी वक्तव्य को गंभीरता से नहीं लेने वाली। जो व्यक्ति लोकसभा चुनाव में जनता से अच्छे दिन लाने के वादे कर अपने अच्छे दिन लाये हुए सवा साल का समय गुजार गया और जनता को उस राह पर ले आया कि उसे पहले से भी बुरे दिन गुजारने पड़ रहे हों, तो भला लोग उसपर कैसे भरोसा कर सकते हैं।

गांव के किसानों और मजदूरों के मतों से सत्ता में पहुंचे लोग गांव वालों को भूल शहर वालों के साथ हो गये हैं। दूसरी ओर भारतीय किसान यूनियन जैसे किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाले संगठन आपसी विभाजन का शिकार हो गये और उनके नेता किसानों के हितों को भूल निजि स्वार्थों के वशीभूत हो गये। कई नेता राजनीति की ओर बढ़ चले तथा कई ने अलग-अलग नामों से संगठन बना लिये। इससे किसान और गांव की लड़ाई कमजोर पड़ गयी। देश और प्रदेश सरकारें किसानों की इस कमजोरी को समझ रही हैं। इसीलिए किसानों की कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही। वे गन्ना भुगतान के लिए दर-दर मारे फिर रहे हैं। किसानों के हक में अदालत का दिया आदेश भी सरकारें नजरअंदाज कर रही हैं, इससे दुर्भाग्यशाली और क्या होगा?

स्व. महेन्द्र सिंह टिकैत द्वारा स्थापित भारतीय किसान यूनियन भी तीन भागों में बंट गयी है। भाकियू (भानु) और भाकियू (असली) के नाम से दो और भाग इसके हुए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण टिकैत की मृत्यु के बाद उनके दोनों बेटों की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें हैं। उनकी कार्यशैली से पुराने समर्पित कार्यकर्ता खुश नहीं थे। वे एक-एक कर या तो संगठन छोड़ गये अथवा उन्होंने अपनी गतिविधियां बहुत सीमित कर दीं।

भाकियू (भानु) और भाकियू (असली) के अस्तित्व में आने का भी नरेश टिकैत और राकेश टिकैत की चौधराहट एक बड़ा कारण रही है। जहां बड़े टिकैत महत्वपूर्ण फैसलों पर किसानों की राय लेना जरुरी समझते थे, वहीं दोनों जूनियर टिकैत स्वेच्छा से कोई भी फैसला ले लेते हैं।

अमरोहा लोकसभा सीट से अमरोहा के किसान नेताओं को राकेश टिकैत के चुनाव लड़ने का तब पता चला जब वे टिकट लेकर यहां पहुंचे। भाकियू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजयपाल सिंह को भी अपने संगठन के प्रवक्ता के इस फैसले की खबर तभी दी गयी जब राकेश टिकैत रालोद उम्मीदवार बनकर यहां उनके घर आये। दूसरे किसानों की तो बात ही क्या है?

परिणाम सभी जानते हैं। टिकैत की शर्मनाक पराजय ने किसानों में उनकी हैसीयत को बेनकाब कर दिया। यही वजह है कि इसके बाद न तो राज्य सरकार और न ही केन्द्र सरकार ने भाकियू या किसानों की किसी परेशानी की ओर कोई ध्यान दिया।

उधर वीएम सिंह का किसान संगठन भी राजनीति में कूदने की घोषणा कर चुका। चुनाव आने दो वीएम सिंह को भी किसान ऐसा ही तोहफा देंगे। जबतक दस जगह बंटा किसान एकजुट नहीं होगा, उसके नेता अलग-अलग ढपली लेकर अलग-अलग राग अलापना नहीं छोड़ेंगे, तबतक सफलता नहीं मिलने वाली। यह एकता तबतक नहीं होने वाली जबतक किसान नेता निजि स्वार्थों को छोड़ किसान हितों को गंभीरता से नहीं लेंगे।

वीएम सिंह ने लंबे समय तक किसानों के लिए अदालतों में मुकदमें लड़कर वास्तव में उनके लिए बहुत कुछ किया है लेकिन वे भी तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकते जबतक उनके साथ ईमानदारी से दूसरे नेता भी संघर्ष के लिए आयें। किसान संगठनों की गुटबंदी किसानों के हितों को लाभ के बजाय क्षति पहुंचाने का ही काम कर रही है। यदि ये नेता एक मंच पर नहीं आये तो किसान और भी बुरे दिन देखने को मजबूर हो सकते हैं। जबकि संगठित किसान देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यह हमने बीते दिनों में बार-बार सिद्ध किया है।

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-जी.एस. चाहल.

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