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आखिर कैसे बहे बिहार में बदलाव की बयार?

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बिहार में विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी माहौल गरमाना शुरु हो गया है। प्रधानमंत्री की दो सभाओं ने चुनावी हलचल तेज कर दी। इस चुनाव में एक ओर भाजपा के नेतृत्व वाला राजग तथा दूसरी ओर मुख्यमंत्री नीतीश, लालू और कांग्रेस का महागठबंधन हैं। नीतीश के पुराने साथी जितिन मांझी भाजपा के खेमे में चले गये हैं। परिणाम कुछ भी हो टक्कर दो ध्रुवीय है। इसमें किसका पलड़ा भारी रहेगा, यह सियासी जमात के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन क्या यह चुनाव बिहार की तकदीर और तस्वीर बदलने में सफल होगा -यह सवाल सबसे बड़ा है।

आबादी के लिहाज से देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद आजादी के बाद भी तरक्की नहीं कर पाया तथा देश के पिछड़े राज्यों में उसकी गिनती होती है। बिहार की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी देश के दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी कमाने को विवश हैं। मजदूरी, ठेला और रिक्शा चलाने वाले यहां के लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब तथा मुंबई तक मिल जायेंगे। हालांकि कई पढ़े-लिखे तथा जागरुक लोगों ने बिहार से बाहर दूसरे राज्यों के  शहरों में अच्छी नौकरियां और बड़े-बड़े व्यवसाय भी कर लिए हैं। वे राजनीति से लेकर कला जगत में भी नाम कमा रहे हैं। परंतु यह सब बिहार से बाहर जाकर ही संभव हो पाया है। सवाल है कि आखिर बिहार में रहकर बिहार का आदमी प्रगति क्यों नहीं कर पा रहा?

जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं को लोकनायक तक की उपाधि या सम्मान प्रदान किया गया है। कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नांडीज जैसे नेताओं का खूब गुणगान किया जाता रहा है। कई अन्य नामी गिरामी नेता बिहार की कोख से जन्मे हैं जिन्हें कोई राष्ट्र-निर्माता, कोई भाग्यविधाता, कोई गरीबों का मसीहा और किसी को समग्र क्रांति का अग्रदूत कहा जाता रहा है बल्कि आज भी हमारे नेता तथा मीडिया के विद्वान बंधु ऐसे ही सम्बोधन उनके लिए प्रयोग करते हैं लेकिन देश की तकदीर बदलने का दावा करने वाले ऐसे महात्मा अपनी जन्मस्थली बिहार की तकदीर और तस्वीर को क्यों नहीं बदल पाये? इस सवाल का जबाव हमारे जैसे बहुत से लोगों के पास है, परंतु हमेशा अपने आभामंडल को निशकलंक बनाये रखने वाले चंद छद्म देशभक्तों और कथित समाजसेवियों को हजम नहीं होगा।

बिहार के लालू प्रसाद यादव और उनके चारा घोटाले को कौन नहीं जानता। नीतीश कुमार कुर्सी के लिए कभी भाजपा व कभी लालू का दामन पकड़ते हैं। कभी सोनिया गांधी की परिक्रमा करते हैं। जीतनराम मांझी को जब चाहें मुख्यमंत्री बनाते हैं, रास न आने पर फिर पैदल कर देते हैं। उधर भाजपा के सहयोगी केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान कभी यूपीए, कभी राजग,जहां भी कुर्सी का प्रबंध हो मिलाप करने के माहिर हैं। केन्द्र का सबसे बड़ा मंत्रालय रेल सबसे अधिक बार बिहार के हिस्से में रहा है। केन्द्र की हर सरकार में इस राज्य को अच्छा प्रतिनिधित्व मिला है।

यूपीए सरकार के शासन में इस राज्य को खूब पैसा मिला। नीतीश कुमार के नेतृत्व में विकास भी बताया जा रहा है। मनरेगा ने भी राज्य की थोड़ी तस्वीर बदली है। फिर भी यहां की जातीय राजनीतिक सौदेबाजी, सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने इस राज्य की आर्थिक रीढ़ तोड़कर रख दी है। दूसरे राज्यों में दलित हैं लेकिन यहां 18 ऐसी जातियां हैं जो अपने से उच्च गिनी जाने वाली जातियों के भेदभाव तथा शोषण के कारण महादलित कहलाने को विवश हैं। यहां तक सुना जाता है कि इन लोगों को चुनाव के दौरान जबरन वोट डलवाने को दबाव में लिया जाता है। दबंगई के चलते वे ऐसा करने को मजबूर होते हैं।

भले ही प्रधानमंत्री हाल ही में यहां आयोजित दो सभाओं में लालू और नीतीश की जमकर आलोचना से खुश हो रहे हों लेकिन भाजपा में भी यहां जो नेता हैं, वे भी बिहार के इन नेताओं से अलग नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर जनता के जांचे और परखे हुए हैं। भाजपा इसीलिए किसी चेहरे को मुख्यमंत्री पद के लिए सामने नहीं ला रही। इसी से उसकी नीयत भी संदेह से परे नहीं है। जनता भी यह समझ रही है।

चुनाव प्रचार के दौरान एक बार फिर बिहार में सभी नेता एक दूसरे पर वाक प्रहार करते रहेंगे तथा जन समस्याओं को दूर करने का किसी के पास न तो फॉमूर्ला है और न ही किसी का इरादा। इन नेताओं का एकमात्र उद्देश्य बिहार की सत्ता पर कब्जा जमाना है। सत्ता की इस जंग में बिहार के आम आदमी की तकदीर और राज्य की तस्वीर बदलने का कहीं से भी कोई संकेत तक नहीं दिखाई दे रहा।

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-जी.एस.चाहल.

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