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बढ़ती आबादी, अपराध, बेरोजगारी और आतंक

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देश की तेजी से बढ़ रही आबादी का बोझ देश उठाने में असमर्थ होता जा रहा है जिसके कारण बेरोजगारी, अपराध, भय और भूख बढ़ते जा रहे हैं। विकास के सपने दिखने वालों ने यदि आंखें नहीं खोलीं तथा आबादी पर सख्ती से नियंत्रण नहीं किया तो यह देश बहुत पीछे चला जायेगा।

सरकार कहती है कि वह नवयवुकों को कौशल विकास के जरिये काम करने लायक बनाने जा रही है। लोगों को कुशलता सिखाने वालों को पता होना चाहिए कि देश में पहले ही शिक्षित और प्रशिक्षित लोगों की भीड़ है और बेलगाम इंसानी पैदावार के कारण प्रतिवर्ष एक करोड़ से ज्यादा लोग उस भीड़ में जुड़ जाते हैं। सरकार उनमें से कितनों को कौशल प्रदान करेगी? कितने कुशल लोगों को रोजगार देगी? कहां देगी? इसका जबाव कहां है?

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गत वर्ष रेलवे भर्ती बोर्ड (इलाहाबाद) ने 2609 डी वर्ग के पदों की रिक्तियां निकालीं। इसकी परीक्षा में 11 लाख 60 हजार 765 नवयुवक बैठे। योग्यता हाइस्कूल मांगी गयी। जबकि अधिकांश आवेदक इससे अधिक पढ़े-लिखे थे। उच्च शिक्षित भी डेढ़ सौ थे। इनमें एमसीए, एमटेक, एमकॉम, एमएससी, बीसीए और बीटेक पास नवयुवक भी खासी तादाद में थे। जब हाइस्कूल पास की जगह उससे कहीं अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं का जमघट देश में है तो सरकार का यह कहना बिल्कुल बकवास है कि देश में अकुशल लोग हैं। और कौशल विकास के जरिये युवकों को काम करने लायक बनाया जायेगा।

रेलवे भर्ती का यह तो एक मामूली उदाहरण है जबकि सभी रिक्तियों का यही हाल है। सैकड़ों की जरुरत पर लाखों युवकों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है। वह भी शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं की।

यह सब बढ़ती आबादी के कारण है। सरकार आबादी नियंत्रित करने पर कोई ध्यान नहीं दे रही। देश में पढ़े-लिखे बेरोजगारों की भीड़ हर वर्ष बढ़ती जा रही है। जबकि रोजगारों का ग्राफ बढ़ने के बजाय घट रहा है। बढ़ती आबादी राष्ट्रीय संसाधनों पर भारी पड़ती जा रही है। सरकार साल में एक-दो लाख नौकरियों का प्रबंध कर भी दे तो यह ऊंट के मुंह में जीरा है।

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इसके कारण बेरोजगारों की बढ़ती जा रही फौज में से अनेक नवयुवक अपराध की दुनिया में प्रवेश करते जा रहे हैं। आतंकवाद की दुनिया में भी कई पढ़े-लिखे नौजवानों का शामिल होना इस बेलगाम बढ़ रही आबादी और उसके कारण बढ़ रही बेरोजगारी भी एक बड़ा कारण है। कई कुंठित नवयुवक नशे के आदि होते जा रहे हैं। कई घरों में यह समस्या बरबादी का कारण बनती जा रही है। न तो सत्ताधारी पार्टियां और न ही विपक्षी दल बढ़ती आबादी के दुष्परिणामों को जानते हुए उसपर लगाम कसने के प्रति संजीदा हैं और न ही इस बारे में मुंह तक खोलना चाहते हैं। सभी अपना-अपना वोट बैंक देख रहे हैं -देश के वर्तमान और भविष्य की किसी को चिंता नहीं।

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-जी.एस. चाहल.

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