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बसपा और भाजपा आसान कर रहे सपा की जीत का मार्ग

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लगता है बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी यह मान चुकी है कि जिला पंचायत बोर्ड पर राज्य में सरकार होने के कारण समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहेगा। ये दोनों दल एक-एक वार्ड में कई-कई लोगों द्वारा उम्मीदवारी का दावा करने के वावजूद अभी तक उम्मीदवार तय नहीं कर पाये, जबकि सपा ने अधिकांश वार्डों में उम्मीदवार उतार दिये, जो अपना प्रचार करने में भी जुट गये। जबतक बसपा और भाजपा अपने उम्मीदवार तैयार कर पायेंगे तबतक सपा प्रत्याशी अपनी जमीन तैयार कर आगे हो चुके होंगे। यह अलग बात है कि चन्द मजबूत उम्मीदवार भले ही स्थानीय समीकरणों के बल पर चुनाव जीतने में सफल हो जायें।

सबसे बड़ी गलती यहां बसपा कर चुकी और अभी भी वह उसमें बदलाव लाने को तैयार नहीं लगती। उसके पास उम्मीदवारी के लिए अधिकांश मजबूत उम्मीदवार मैदान में आना चाहते थे। यदि जिला स्तरीय कमेटी के नेता व्यक्तिगत स्वार्थों के बजाय पार्टी के हित पर ध्यान देकर ऐसे लोगों को टिकट दिलाने की कोशिश करते और बसपा सुप्रीमो जिला स्तरीय कमेटी को इसके लिए अधिकृत करतीं, तो अमरोहा जिला पंचायत पर इस बार भी नीला झंडा लहरा सकता था।

यहां सपा को एक वर्ग विशेष की पार्टी माना जा रहा है। उसमें भी एक मंत्री के एकाधिकार से उसी वर्ग के निचले स्तर के नेता परेशान हैं। यही कारण है कि इस बार बसपा में उम्मीदवारी के लिए मुस्लिम समाज के लोग भारी तादाद में आ रहे थे। यही नहीं गैर दलितों का भारी झुकाव जिले के वार्डों में दलितों के निर्णायक मतों के कारण बसपा की ओर था। इन जातियों में जाट, गुर्जर तथा ब्राह्मण और खड़गवंशी शामिल हैं। यदि बसपा नेताओं में थोड़ी बहुत भी समझ होती तथा वे निजि स्वार्थों को दरकिनार कर इन वर्गों से उम्मीदवारों को अपने साथ लाते तो बसपा का सर्वजन समाज का नारा तो साकार होता ही बल्कि जिला पंचायत पर उसका कब्जा भी हो जाता।

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जिले में वार्ड परिसीमन में सपा नेताओं ने जाट और खड़गवंशी जातियों के मतों को विभाजित करने का पूरा ध्यान रखा। नये परिसीमन में इस बात पर बहुत जोर लगाया गया। इससे दलित मतों की ओर सपा का ध्यान नहीं गया और कई नये वार्ड इस तरह अस्तित्व में आये कि उसमें दलित मत निर्णायक हालत में हैं। यही कारण है कि कई जाट, मुस्लिम और खड़गवंशी बसपा उम्मीदवारी के प्रयास में छटपटाते रहे। बसपा नेताओं ने इस ओर ध्यान दिया होता तो वे सबसे मजबूत दल बनकर उभरता। इसमें केवल उच्च स्तर से ही नहीं बल्कि जिला स्तर पर भी भारी चूक हुई है। इसका खामियाजा बसपा इस चुनाव में अवश्य भुगतेगी।

उधर भाजपा की आपसी गुटबंदी तथा पूर्व और मौजूदा सांसदों के आपसी मतभेदों के कारण उम्मीदवारी चयन में विलंब हुआ है तथा इसका लाभ कहीं सपा, तो कहीं बसपा को भी मिलेगा। टिकट न मिलने से नाराज कई भाजपाई अपने उम्मीदवार का विरोध करने पर उतारु होने को तैयार हैं। यहां उन स्थानों पर भाजपा को भारी क्षति उठानी पड़ सकती है जहां सपा से उसका सीधा मुकाबा होगा यानि तीसरा उम्मीदवार बेहद कमजोर होगा। कई भाजपाई यह कहते फिर रहे हैं कि पंचायत चुनावों में राज्य का सत्ता पक्ष ही सफल होता है। इसलिए हमें इधर मेहनत करने के बजाय विधानसभा चुनाव पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

हालत यह है कि भाजपाई मानसिक रुप से ही जीत स्वीकार करने को तैयार नहीं। दूसरी ओर भाजपा का युवा वर्ग चुनाव का आगाज होने के साथ ही उत्साह से बेहद लबरेज था, जो सही समय आते-आते भाजपा के जिला नेतृत्व तथा सांसद की शिथिलता से मायूस होता जा रहा है। एक ओर उसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी सपा से चुनौती मिल रही है जबकि उसे अपने ही नेताओं के गैर जिम्मेदाराना रवैये का भी शिकार होना पड़ रहा है।

यह कहना कुछ भी गलत नहीं कि सपा जिला पंचायत का यह चुनाव यदि जीतने में सफल रही तो उसके लिए बसपा और भाजपा नेताओं की अदूरदर्शिता तथा ताजा हालातों को न समझने की कमी सपा की राजनैतिक चालबाजियों से अधिक जुम्मेदार होगी।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.

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