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तंत्र साधना के नाम पर नन्हें फरिश्तों का कत्ल कब तक?

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एक पिता ने मनोकामना पूरी होने के अंधविश्वास में अपनी छोटी सी बच्ची की हत्या कर दी और रात भर कमरे में बच्ची के शव के पास देवी को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करता रहा। पुलिस को पता चला तो मौके पर आकर सुबह उसे गिरफ्तार कर लिया। न देवी उसे बचाने आयी, न ही वह तांत्रिक जिसके विश्वास पर उसने इस क्रूरतम अपराध को अंजाम दिया। उसकी मनोकामना तो पूरी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। यह घटना गत सप्ताह उत्तर प्रदेश के एक जिले की है जिसे कुछ ही समाचार पत्रों ने मामूली खबर की तरह प्रकाशित किया।

हमारे देश में इस तरह की घटनायें रह-रहकर कई स्थानों पर घटती रहती हैं। प्रतिवर्ष कई मासूम धर्म की आड़ में जारी इस बेहद लोमहर्षक और क्रूर प्रथा के कारण अत्यंत क्रूरता से मार दिये जाते हैं। हम 21वीं सदी के वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। शिक्षा का प्रसार समाज के सभी वर्गों तक पहुंच चुका है। फिर भी इस बेहद घृणित, क्रूरतम तथा अमानवीय हिंसावादी सोच से बाहर नहीं निकल सके, बल्कि इस तरह की बलि प्रथा को प्रोत्साहित करने में कई पढ़े-लिखे और समाज के पथ प्रदर्शक अशिक्षितों से भी आगे हैं।

जिन धर्मों के संचालक प्रेम, सौहार्द और अहिंसा की पैरोकारी करते नहीं थकते और स्वयं को सबसे बड़ा आस्तिक होने का दावा करते हैं, वे भी ईश्वर, देवी-देवता तथा इसी तरह की शक्तियों के नाम पर पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और नरबलि तक देने को शुभ कर्म समझते हैं। इसके लिए अजीबोगरीब कहानियां और एतिहासिक मिथकों को गढ़कर बेकसूर जीवों की बर्बर हत्यायें की जा रही हैं।

तांत्रिक विद्या के नाम पर हमारे देश में कई स्थानों पर अघोरी तथा काली देवी के पुजारियों ने अड्डे बना लिये हैं। दरअसल महाभारत काल तक किसी देवी-देवता की मूर्तियों के पूजन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उसके बाद बौद्ध काल तक भी भारत में मठ, मंदिर या देवालय का उल्लेख नहीं है। आश्रम पद्धति के जरिये पूजा-पाठ तथा धार्मिक और सैनिक शिक्षाओं का जिक्र है। राजा दशरथ की रानियां भी संतानोत्पत्ति के लिए वशिष्ठ मुनि के आश्रम में गयी थीं।

बौद्ध धर्म ने सबसे पहले देवालयों और मठों का निर्माण कराया। जिनमें बुद्ध की मूर्तियां और खड़ाऊं पूजा के लिए रखी गयीं। हिन्दुओं ने उनकी नकल करते हुए देवालय और मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें समयानुसार जिसने जैसी चाही मूर्तियां स्थापित कर लीं। प्रमाण के लिए बौद्ध और जैन मंदिर हिन्दुओं के मंदिरों से प्राचीन हैं जबकि ये दोनों धर्म हिन्दू धर्म से बाद अस्तित्व में आये।

यह लंबा विषय है, इसलिए मैं मूल विषय पर आता हूं। इतिहास के जानकारों को पता है कि जैन-बौद्ध धर्म से पूर्व भारत में कई धार्मिक अनुष्ठानों में पशु और मानव बलि का प्रचलन था। अहिंसा के कारण जहां लोग बौद्ध धर्म की ओर मुड़े वहीं बाद में हिंसा के शिकार होकर बौद्धों को यहां से भागना पड़ा। आदि शंकराचार्य ने भी हिन्दुत्व को अहिंसावादी चोला उस समय पहनाया लेकिन पूरे भारत में यह संभव नहीं था। सदियों से चली आ रही बलि प्रथा इतनी आसानी से समाप्त नहीं हो सकी। देवताओं के साथ ऐसे लोगों ने ही देवियों को उनसे भी बड़ी शक्तियों के रुप में खड़ा कर लिया। काली देवी का रुप ही देखकर पता चलता है कि उसे क्या करना चाहिए?

तांत्रिक लोग काली और चामुंडा की पूजा तंत्र साधना के नाम पर करते हैं तथा मुर्गे, बकरे और शराब का सेवन इन देवियों के नाम पर खूब खुलेआम करते देखे जा सकते हैं। कई स्थानों पर जन जागृति होने से इस तरह की प्रथाओं पर रोक लगी है।

काशीपुर में काली मंदिर में भैंसा मारा जाता था जिसपर लोगों ने स्वयं रोक लगायी है। भारत तथा नेपाल में अभी भी कई धर्म स्थलों पर आज भी ये प्रथायें जारी हैं। फिल्मी अभिनेता अमिताभ बच्चन जिन्हें लोग सदी का महानायक कहकर सफेद झूठ बोलते हैं, ने भी परिवार के साथ एक मंदिर में चार जीवों की बलि दी थी, भले ही वे आज स्वयं को शाकाहारी कहते हों।

यहां मैं कहना चाहता हूं कि जीव हत्यायें नहीं होनी चाहिएं, धर्म के नाम पर तो इस तरह का काम करना महापाप और महा अपराध है। इसे प्रोत्साहित करने वालों, खासकर बच्चन जैसे लोगों पर तो और भी सख्त कार्रवाई की जरुरत है, क्योंकि इनके द्वारा किये  कामों का अनुसरण बहुत से लोग आंख मूंद कर करते हैं।

बेकसूर बच्चों की हत्याओं को तंत्र विद्या के नाम पर अंजाम दिलाने वाले तांत्रिकों पर प्रतिबंध लगना चाहिए। हो सके तो तंत्र साधना पर ही प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

सबसे सरल रास्ता यह है कि तांत्रिक को पकड़ कर भीड़ के बीच उससे कहा जाये कि वह तंत्र के जरिये कुछ कर सकता है तो स्वयं को बंधन मुक्त करके दिखाये। उसे वहां बांधकर डाल देना चाहिए। उसके खास भक्तों को दिखाया जाये और पूछा जाये कि अब इसकी दैविक शक्तियां और सिद्धियां कहां चली गयीं?

तांत्रिकों द्वारा प्रति वर्ष मारे जा रहे बेकसूर बच्चों को बलि का बकरा बनने से रोकना हम सभी का फर्ज है। यह तभी संभव है जब जगह-जगह बैठे ठग तांत्रिकों का बहिष्कार किया जाये।

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-जी.एस. चाहल.

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