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सूखे की चपेट में उत्तर प्रदेश

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समय पूर्व मानसून विदा होने से उत्तर प्रदेश में सूखा पड़ना शुरु हो गया। एक सप्ताह से चल रही पछुआ हवा ने खेतों में खड़ी फसलों पर अपना प्रभाव दिखाना शुरु कर दिया है। फसलें पानी मांग रही हैं तथा किसान अपने सामर्थ्य के अनुसार सिंचाई भी कर रहा है लेकिन बिजली न मिलने से वह सफल नहीं हो रहा। डीजल खरीदने को उसकी जेब में इस बार पैसा नहीं है। गन्ने का भुगतान न मिलने से उसकी समस्यायें बढ़ी हैं। यदि भुगतान को और विलंब हुआ तथा बिजली में सुधार नहीं किया गया तो धान और गन्ने के साथ दलहन और चारा भी चौपट हो जायेगा। पहले ही दालों के भाव आकाश छूने को बेताब हैं। हालात नहीं सुधरे तो लोग दालों के लिए तरस जायेंगे। अभी तो सरकार सौ हजार टन दालें आयात करने पर विचार कर रही है, फिर उसे इतनी ही और आयात करनी होंगी।

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दोपहर के समय खेतों की हालत देखी नहीं जा रही। परेशान किसान धरने, प्रदर्शन और यातायात बंद करने तक को मजबूर हो रहा है और सरकार व प्रशासन उसकी समस्या को समझे बिना, उलटे किसानों के खिलाफ उत्पीड़क कार्रवाई कर रहा है, उनपर झूठे केस लगाकर बंद करने की धमकियां दी जा रही हैं।

गेहूं की बरबादी के बाद किसानों को गन्ने से राहत की उम्मीद थी, लेकिन उसका गन्ना बिकने के बाद भी उसे भुगतान नहीं किया गया। बरसाती फसल में धान से उसे उम्मीद थी। दालें भी खेतों में खड़ी हैं, लेकिन सूखा पड़ने से उसपर खतरा बढ़ गया है। उसे निराशा घेर रही है। गन्ने की फसल के जब पिछले ही पैसे नहीं मिले तो तैयार हो रही फसल का क्या भरोसा।

दूसरी ओर मौसम की बेरुखी के कारण यह भी पता नहीं कि फसल कितनी बचेगी या बचेगी भी नहीं। उसे रबी फसल की बुवाई के लिए धान चाहिए। जब अभी जेब खाली है, उलटे किसान कर्ज से दबा है, तो क्या कहा जा सकता है।

यदि 15 घंटे भी बिजली मिल जाये तो उसे कुछ राहत मिल भी सकती है। इसके लिए केन्द्र और राज्य की सरकारों को त्वरित कदम उठाने होंगे। नहीं तो इस बार किसान आत्महत्या नहीं, बल्कि इन सरकारों से ही आर-पार की तैयारी में हैं।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.

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