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मजबूर मोदी सरकार, यू-टर्न लेने की अभ्यस्त बन चुकी भाजपा

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कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए केन्द्र सरकार द्वारा पारित बिल 2013 को रद्द कर भाजपा सरकार जो नया बिल लाने पर अड़ी थी, वह अब उससे पीछे हटने को मजबूर हो गयी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके वरिष्ठ सहयोगी बार-बार सन् 2013 के बिल को जल्दबाजी में पारित किया बिल कहकर उसकी मनगढंत खामियां गिनाने को एड़ी-चोटी का जोर लगाकर रद्द कराने का प्रयास कर रहे थे। नया बिल पास कराने को भाजपा सरकार संसद का संयुक्त सत्र तक बुलाने पर विचार कर रही थी। इससे विपक्ष के विरोध तथा किसानों में व्याप्त रोष व्याप्त था। इससे बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को लोगों, खासकर किसानों के विरोध से हानि का आभास हुआ। अपने अधिकांश फैसलों पर यू-टर्न लेने की अभ्यस्त बन चुकी भाजपा ने किसानों के खौफ से डरकर नया बिल लाने का इरादा त्याग दिया। अब उसे 2013 का भूमि आरक्षण बिल ही अच्छा लगने लगा।

यह अच्छा ही हुआ कि भाजपा के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था, वहीं तो नया भूमि बिल कभी का कानून बना दिया गया होता। भले ही विपक्ष तो क्या भाजपा के आनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच भी इसका विरोध करते।

यह सभी जानते हैं कि कल तक नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्री अरुण जेटली, नितिन गडकरी, वैंकेया नायडू तथा प्रकाश जावड़ेकर 2013 के बिल को विकास विरोधी तथा प्रस्तावित बिल को किसानों और गांव वालों का हितैषी कहकर किसानों की भूमि हड़पने का प्रयास कर रहे थे।

सरकार द्वारा किये वायदों को पूरा न करने के कारण अब किसान उसपर भरोसा नहीं कर रहे। चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कृषि जिंसों पर 50 प्रतिशत लाभकारी मूल्य देने का वादा किया था, सरकार बनते ही उसे देने से मना कर दिया, बल्कि उनकी भूमि छीनने का भय भी उनमें पैदा कर दिया। किसान जानता है कि भूमि एक ऐसी संपत्ति है जो उत्पादन देने के बाद भी कभी समाप्त नहीं होती और पीढ़ी दर पीढ़ी उसके काम आती रहती है। ऐसे में इसकी कीमत मापना सरल काम नहीं।

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सरकार दावा कर रही थी कि भूमि उपलब्ध न होने से देश की विकास योजनायें ठप्प हैं। जबकि सरकारी रिपोर्ट केवल 8 फीसदी योजनायें भूमि उपलब्ध न होने से ठप्प हैं। दूसरी ओर विशेष आर्थिक जोन में पहले ही अधिगृहीत जमीन में से 62 फीसदी खाली पड़ी है और पांच राज्यों में वर्षों पूर्व किसानों से ली भूमि के 45 फीसदी पर कोई निर्माण भी शुरु नहीं किया गया। इससे भी मजेदार बात यह है कि डेढ़ करोड़ भवन बने खड़े हैं। उन्हें कोई रहने या खरीदने वाला नहीं मिल रहा। इन्होंने लाखों हेक्टेअर कृषि भूमि को कंकरीट का जंगल बना दिया।

उ.प्र. के गजरौला नगर में औद्योगिक विकास के नाम पर तीन दशक से भी अधिक समय पूर्व हजारों हजारों बीघा अधिगृहीत भूमि पर उद्योग ही लगाने वाला नहीं मिल रहा जबकि यहां शुरु हुई एक दर्जन फैक्ट्रियां बंद हो गयीं और बेशकीमती कृषि भूमि पर कंक्रीट बिछाकर उसे बरबाद कर दिया गया। इस तरह के हालात पूरे देश में हैं।

दरअसल सरकार का देश और गांव के विकास से कोई ताल्लुक नहीं बल्कि इस तरह से देश के पूंजीपतियों को सस्ती भूमि हस्तांतरित कराकर बाद में उसे महंगे दामों में बदलवाने का षड़यंत्र है जिसे नया बिल लाकर कानूनी जामा पहनाने का प्रयास था।

तीन राज्यों में होने वाले चुनावों में खतरे के भय से भाजपा ने भले ही अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं लेकिन यदि बिहार, यूपी और पंजाब में भाजपा को विजय मिल गयी तो देर-सबेर राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जायेगा। ऐसे में नया भूमि बिल पारित कराने से उसे कोई रोकने वाला नहीं। बिहार, यूपी और पंजाब के किसानों को ऐसे में बहुत सोच समझकर मतदान की जरुरत होगी।

-जी.एस. चाहल.

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