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बिहार की सत्ता की नाव का मांझी कौन?

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चुनावी माहौल में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बिहार में हमारे देश के नेता जमकर भाषणबाजी कर रहे हैं। टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक जातीय समीकरण यहां मुख्य भूमिका में हैं। कुछ भी कहा जाये लेकिन एक चीज आजादी के बाद भी बिहार में नहीं बदली -वह है जातीय विभाजन। यहा विभाजन ही बिहार की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा रहा है। विभिन्न जातियों में बंटे बिहार में चुनाव के दौरान यह मुद्दा कुछ ज्यादा ही मुखर हो उठता है।

जैसे जातीय तथा धार्मिक समीकरण यहां बन बिगड़ रहे हैं उन्हीं के आधार पर आगामी सरकार का आकलन किया जा सकता है। दस वर्ष पीछे मुड़ कर देखें तो नीतीश कुमार की जदयू तथा भाजपा के गठजोड़ ने लालू और कांग्रेस के साथ ही यहां के कई छुटपुट दलों को भी सत्ता के पास तक नहीं फटकने दिया। इन दोनों के गठजोड़ में जहां भाजपा के साथ बिहार की अगड़ी जातियां थीं। वहीं जदयू में दलित और पिछड़े वर्ग की बहुलता थी। मुस्लिम अल्पसंख्यक भी अच्छी तादाद में जदयू के साथ थे।

लगभग दो वर्ष पूर्व नीतीश की जदयू से भाजपा के अलग होने पर नीतीश को लालू की राजद, कांग्रेस तथा चन्द निर्दल विधायकों के सहयोग से सरकार चलानी पड़ी। नीतीश की पार्टी का एक धड़ा महादलित नेता जीतनराम मांझी के साथ चला गया। बिहार में 18 महादलित जातियां मानी जाती हैं। कई विधानसभाओं में ये निर्णायक संख्या में हैं। मांझी जदयू छोड़ आज भाजपा के साथ हैं।

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आज जो जातीय समीकरण बन रहे हैं वे हर हाल में महागठबंधन के खिलाफ हैं और एनडीए के हक में इसी से वातावरण बनता दिख रहा है। राजनीतिक पंडित और चुनाव विश्लेषक कुछ भी कहें लेकिन बिहार में तो जातीय समीकरण पूरी तरह एनडीए को बहुमत की सरकार बनवाने की भूमिका में हैं।

नये चुनावी वातावरण में नीतीश लालू और कांग्रेस का महागठबंधन कई कारणों से बेहद कमजोर है। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी महादलित मतों को लेकर है। पिछले सभी चुनावों में यह वर्ग उनके साथ था लेकिन जीतनराम मांझी से मुख्यमंत्री पद छीनना नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनैतिक भूल सिद्ध होगी। पहले तो उन्हें मांझी को अपनी नाव की पतवार ही नहीं पकड़ानी थी लेकिन पकड़ाने के बाद उसे मांझी से छीनना उससे भी बड़ी गलती थी। इस दांव का बिहार के महादलित मतदाताओं पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इस वर्ग का मतदाता मांझी के साथ सहानुभूति पूर्वक जुड़ा है। मांझी समर्थक मतदाता नितीश कुमार के पाले से कटकर एनडीए में जुड़ गये हैं। जो भाजपा के लिए बड़ी ताकत बनते जा रहे हैं।

सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी जितने भी मत लेगी वे सारे महागठबंधन के ही कम होंगे। यह झटका भी नीतीश-लालू गठबंधन को क्षति पहुंचायेगा। उधर सपा के नेतृत्व वाला छह दलों का गठबंधन भी महागठबंधन को ही नुकसान पहुंचायेगा। बसपा भी यहां 243 सीटों पर लड़ रही है। वह महागठबंधन और एनडीए दोनों को लगभग एक जैसा ही हानि-लाभ देगी।

मौजूदा चुनावी हालात एनडीए के पक्ष में हैं। नीतीश-लालू महागठबंधन भारी प्रयास के बाद भी सफल होता नहीं दिख रहा। जनता का फैसला लोकतंत्र में ईश्वर का फैसला होता है। फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि बिहार या उत्तर प्रदेश में भाजपा को बढ़त मिलना गांव और गरीब के लिए खतरे की घंटी ही सिद्ध होगा।

-जी.एस. चाहल.

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