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मोदी सरकार की कृषि नीतियों से देश आर्थिक संकट की ओर

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके आर्थिक प्रबंधक यदि कृषि क्षेत्र के संकट को गंभीरता से लेकर उसके निदान के लिए गंभीर नहीं हुए तो देश 1960 जैसे खाद्यान्न संकट की स्थिति में पहुंच सकता है। यह आशंका हाल ही में नीति आयोग के सदस्य और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने व्यक्त की है जबकि हम एक वर्ष से इस तरह की आशंका को सरकार की नयी कृषि नीतियों के बारे में बार-बार दोहरा रहे हैं। कहने और शोर मचाने के जरिये सरकार यह दिखाने का प्रयास कर रही है, मानो किसानों हित में वह बहुत कुछ कर रही है। इस दिशा में टीवी चैनलों के जरिये जो प्रचार किया जा रहा है उससे किसानों को रत्ती भर भी लाभ नहीं मिलने वाला जबकि इस तरह के कार्यक्रम बनाने वालों तथा अमिताभ बच्चन जैसे अमीर लोगों को और अमीर बनाने का काम चल रहा है। इसी तरह किसान और किसानी के उत्थान के नाम पर करोड़ों रुपये प्रतिदिन खर्च किये जा रहे हैं जबकि जरुरत है किसानों की फसलां के उचित मूल्य और समय पर भुगतान की।

हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के वावजूद किसानों को बीते गेहूं सीजन में 2200 रुपये एमएसपी दिया गया जबकि हमारे किसानों को सरकार मात्र 1400 रुपये एमएसपी ही दे रही है। क्योंकि नरेन्द्र मोदी सरकार के घरेलू अर्थशास्त्री और नीति आयोग प्रमुख डा. अरविन्द पनगड़िया तथा डा. अरविन्द सुब्रमण्यम ने पहले ही कह दिया था कि किसानों को अधिक मूल्य देने से खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। जबकि चीन में गेहूं का सरकारी मूल्य 2500 रुपये रखा गया।

अनाज और दूसरे कृषि उत्पादों का मूल्य तबतक कम रखा जाता है जबतक वह किसान के घर होता है। जब वह व्यापारियों के घर में चला जाता है तो उसका मूल्य बढ़ जाता है। कितनी मजेदार बात है कि तब खाद्य मुद्रास्फीति नहीं बढ़ती। जो गेहूं किसान से 1400 रुपये में खरीदी जाती है। उसका आटा पीसते ही स्वामी रामदेव उसे 2600 रुपये बेचते हैं। दालें बाजार के हवाले होते ही आसमान का भाव छू रही हैं। अब खाद्य मुद्रास्फीति नहीं बढ़ रही। प्याज किसानों से 7-8 रुपये किलो में खरीद कर मई-जून में सरकार ने 17-18 रुपये किलो निर्यात कर दी। अब बाहर से 45-46 को मंगवाने के ऑर्डर दिये जा रहे हैं। जनता उसे 60—70 रुपये को खरीद रही है। यदि फसल के दौरान किसान को उचित मूल्य दिलाने का काम हो तो किसान उत्पादन बढ़ा सकता है। लेकिन डा. पनगड़िया व डा. सुब्रह्मण्यम जैसे अर्थशास्त्री किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलने देना चाहते। यदि किसानों को 15 रुपये ही प्याज के मिल जाते, तो किसान उत्पादन बढ़ाते इसलिए 45 रुपये को प्याज आयात कराने की नौबत ही नहीं आती, और आज 60—70 रुपये को लोग उसे नहीं खरीद रहे होते। किसान के साथ उल्टा व्यवहार किया जाता है। उत्पादन बढ़ाने के प्रोत्साहन के बजाय उसे दंडित किया जाता है। ऐसे में उसे कई बार आलू, प्याज और टमाटर सड़कों पर फेंकने को बाध्य होना पड़ा है।

पिछले गन्ने का भुगतान न मिलने, रबी में अतिवृष्टि से बरबादी और अब सूखे ही मार, उर्वरकों और बीज का न मिलना, रबी की फसल को भी प्रभावित करेगी। किसान लगातार मुसीबतों के कारण टूट चुका है। जो कुछ वह उगा रहा है उसका सरकारी नीतियों की वजह से उचित मूल्य न मिलने से किसान हतोत्साहित है। यही कारण है कि उसकी क्रय शक्ति खत्म होती जा रही है। बाजारों की बहार गायब है। उद्योगों का माल नहीं बिक रहा। गांव और किसान की दयनीय आर्थिक हालत के कारण देश की पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। पुराने उद्योगों के माल के ग्राहक नहीं है जबकि सरकार कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के बजाय नये-नये उद्योग लगाने को एड़ी-चोटी का प्रयास कर रही है। यह कोई नहीं सोच रहा कि उस माल को खरीदेगा कौन? कृषि उत्पादों का किसानों को उचित मूल्य दिलाये बिना देश का उत्थान नहीं होगा। गेहूं, धान, गन्ना, कपास तथा दालों का मूल्य फसली सीजन में बढ़ाने से समस्या का समाधान होगा।

-जी.एस. चाहल.

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