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पंचायत चुनाव निर्वाचन आयोग के लिए कड़ी चुनौती

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यह पंचायत चुनाव पांच साल पहले बसपा शासन में हुए चुनाव के मुकाबले निर्वाचन आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालांकि चुनाव को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण कराने के लिए चुनाव प्रबंधन ने कमर कस ली है तथा सभी बिन्दुओं पर गहन चिंतन के बाद जो भी बेहतर प्रबंध हो सकते थे उनका सख्ती से निवर्हन करने की रणनीति अपनायी जा रही है तथा चुनाव संपन्न होने तक पूरी सतर्कता की व्यवस्था चाक चौबंद रखने की तैयारी है।

याद दिला दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे हालात पैदा करने के हमारे कुछ नेताओं द्वारा प्रयास किये गये। इसके लिए सपा, कांग्रेस और कथित धर्मनिरपेक्ष दल जहां भाजपा पर आरोप लगाते रहे हैं, वहीं भाजपा, सपा और कांग्रेस को मुख्य आरोपी बनाकर कटघरे में लाने का प्रयास करती रही है।

राजनीतिक दलों की इस कुनीति का उन्हें क्या लाभ मिला वे जानें, लेकिन उस समय के बोये साम्प्रदायिक बीज पूरे राज्य में उगते रहे हैं और उन्हें उखाड़ फेंकने के बजाय समय-समय पर पुष्पित और पल्लवित करने का प्रयास किया जाता रहा है। इसी सिलसिले में अमरोहा जिले के कई गांवों में आज आपसी सद्भाव खत्म है तथा बिना वजह ही कई तत्व यहां मौका देखकर हालात खराब करने का प्रयास करते हैं। पुलिस और प्रशासन पर राजनीतिक दबाव रहता है जिससे वह समस्याओं का निदान करने के बजाय डंडे के जोर से मामला दबा देता है। बीमारी खत्म होने के बजाय दब जाती है जो माहौल माफिक देखते ही पहले से भी भयंकर हो उठती है।

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इस समय दो दर्जन से अधिक गांव ऐसे हैं जो निर्वाचन आयोग ने अति-संवेदनशील से भी संवेदनशील में चिन्हित किये हैं। जनपद के जिन गांवों में साम्प्रदायिक माहौल खराब है वह माहौल अचानक ही खराब नहीं हुआ। कई गांवों में अनायास या परिस्थितिवश कई विवाद या छुटपुट हिंसक घटनायें हो जाती हैं। कई दलाल और छुटभैये नेता उन्हें निजि स्वार्थ के लिए साम्प्रदायिक रुप देने का प्रयास करते हैं। जिसमें वे सफल भी हो जाते हैं। इसी में बड़े और क्षेत्रीय नेता भी कूद पड़ते हैं। राजनीतिक रोटियां सेकने को यह आग जारी रखी जाती है जिसमें इस तरह के गांवों के बेकसूर लोग निशाना बनते हैं।

जिले में जिन दो दर्जन से अधिक गांवों या मतदान केन्द्रों को इस बार अति-संवेदनशील घोषित करना पड़ा है वहां वर्षों पूर्व घटे मामूली विवादों को जो पुलिस और प्रशासन के लिए सुलझाना मामूली बात थी। सुलझाने के बजाय उलझाये रखने के ही प्रयास किये गये हैं। जितनी कमी पुलिस और प्रशासन की है, इसमें अपनी मूंछों को खड़ी रखने के लिए यहां के जनप्रतिनिधि उनसे भी अधिक उत्तरदायी हैं। जब पीड़ित के साथ न्याय के बजाय उसे ही कटघरे में खड़ा किया जाता है तो समस्या सुलझने का सवाल ही नहीं उठता।

-जी.एस. चाहल.

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