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मेढ़ों, रास्तों और मामूली विवादों को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिशें

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सपा शासन में उससे पिछली बसपा सरकार से अधिक गांवों में तनाव की घटनायें बढ़ी हैं। हमें यह नहीं कहना कि इसके पीछे किसका हाथ है लेकिन जनपद के लोग इस सबसे भली-भांति परिचित हैं। पशुओं की चोरी, लूट और बचाव में आने वाले पशु पालकों तक पर हमले किये गये हैं। कई बेरोजगार गरीब पशु पालन के धंधे से जुड़े थे जो इस तरह की घटनाओं से बरबाद होते जा रहे हैं।

गरीब के लिए एक भैंस या एक बकरी आजीविका का साधन होती है। उसका यह भी छिन जाये तो उसकी तो दुनिया ही वीरान हो जाती है। पुलिस या प्रशासन के अधिकारियों और नेताओं के लिए भले ही यह मामूली वारदात हो लेकिन गरीब इसी में बरबादी और आबादी का जीवन जी रहा है।

रास्तों, मेढ़ों, तालाबों और चकबंदी जैसे विवादों को राजस्व विभाग के लेखपाल से लेकर पुलिस, प्रशासन तथा खद्दरधारी तक सुलझाने के बजाय उस स्तर तक ले जाते हैं कि वे उलझते ही चले जाते हैं।

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वर्षों तक न्याय की जंग लड़ते—लड़ते जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो गांवों में आपसी सद्भाव तार-तार होता है। पुलिस और प्रशासन का डंडा तंत्र वहां दबाव के सहारे ऊपरी शांति कायम करता है। यह काम सपा शासन में बहुत जोर पर रहा है। यही कारण है कि आज संवेदनशील गांवों की सूची लंबी हो गयी है जो चुनाव परिणामों के बाद और भी लंबी होगी। निर्वाचन आयोग अस्थायी व्यवस्था कामय कर सकता है। जब स्थायी समाधान और शांति व्यवस्था को कायम करने को तैनात पुलिस, प्रशासन ही अपना दायित्व (दबाव या लालच) के चलते पूरा नहीं कर पा रहा तो ऐसे में पंचायत चुनाव संपन्न कराना निर्वाचन आयोग के लिए एक कठिन चुनौती तो है ही।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.

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