Header Ads

गंगा मेले की रौनक फीकी करेगी किसानों की खाली जेब

गंगा-मेले-की-रौनक-फीकी-करेगी-किसानों-की-खाली-जेब

कार्तिक पूर्णिमा पर प्रतिवर्ष हापुड़ जनपद के गढ़मुक्तेश्वर तथा अमरोहा के तिगरी गांव में गंगा के दोनों ओर उत्तर भारत का विशाल मेला लगता है। मिनी कुंभ माने जाने वाला यह मेला एक सप्ताह तक जमता है। श्रद्धा, पिकनिक और हजारों परिवारों के रोजगार का साधन मेला विशेषकर किसानों और गांव वालों का माना जाता है, हालांकि दूर दराज के बड़े-बड़े नगरों से भी लोग आते हैं।

जिला पंचायतें अपने-अपने जनपद के मेले की व्यवस्था करती हैं। पंचायत चुनावों के बीच इस बार मेले की तैयारी होनी है। जिला प्रशासन और पुलिस के सहारे मेला प्रबंध और सुरक्षा व्यवस्था कायम की जाती है। प्रशासन के पास भरपूर स्टाफ संसाधन मौजूद हैं। अतः कोई चुनौती नहीं है।

किसानों और गांवों का यह मेला इस बार फीका रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। लोगों की जेब खाली है तथा उसमें निकट भविष्य में जान पड़ने की भी आशा नहीं। कारण गन्ने का पिछला भुगतान नहीं मिला, धान की फसल का मूल्य लागत से भी नीचे है। साथ ही चीनी मिलों के समय से चलने का सवाल ही नहीं। क्रेशर और कोल्हू चल रहे हैं। जहां सौ, सवा सौ के आसपास का भाव है। इनसे एक लाभ जरुर हैं, आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसानों को रोजमर्रा जैसी चीजों के लिए पैसा मिल रहा है। उस उचित मूल्य का क्या लाभ जो सालभर बाद भी नहीं मिला। यदि वह मिल गया होता तो अब भाड़े के भाव मीठा गन्ना क्यों लुटाना पड़ता?

गंगा स्नान के लिए परिवार में कपड़े भी बनवाने होते हैं। ठंड से बचाव के लिए लिहाफ और गद्दों का प्रबंध करना पड़ता है। इससे भी जरुरी बाल-बच्चों को मेला खर्च के लिए भी अच्छी खासी रकम चाहिए। बैंकों से पहले ही लिए कर्ज का समय से भुगतान नहीं हो रहा। आगे भी फसल के सहारे गरीबी का मुकबाला करने की उम्मीद नहीं।

बाजारों में मेले से एक माह पूर्व ही कपड़े और अन्य जरुरी सामानों को खरीदने वालों की चहल-पहल शुरु हो जाती थी। इस बार बिल्कुल नदारद है। दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं और पूरा दिन ग्राहकों के इंतजार में ही निकल जाता है। दीवाली की जरुरत की चीजें भी नहीं बिक रहीं। यह कमाल किसानों और गांवों की उपेक्षा के कारण है। यही हाल रहा तो देश की अर्थव्यवस्था का पहिया बिल्कुल जाम हो जायेगा। खाली जेब से किसान और गांव वाले परंपरागत धार्मिक मेले में एक सप्ताह तक रुकने के बजाय केवल पूर्णिमा स्नान से ही संतुष्ट होने को मजबूर होंगे। मेले से गुजर-बसर करने वाले हजारों दुकानदारों के परिवारों को भी निराशा ही हाथ लगेगी।

जी.एस. चाहल के सभी लेख पढ़ें >>

-जी.एस. चाहल.

गजरौला टाइम्स के ताज़ा अपडेट प्राप्त करने के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें.