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गन्ना नीति में सुधार जरुरी

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कोल्हू चलने शुरु हो गये, क्रेशर शुरु होने वाले हैं तथा चीनी मिलों का कुछ पता नहीं कि वे कब चलेंगे या चलेंगे भी नहीं। कोल्हू सौ रुपये को गन्ना खरीद रहे हैं। नया गुड़ बाजार में चीनी से महंगा है। क्रेशर भी सौ, सवा सौ के आसपास ही गन्ना खरीदेंगे। चीनी मिल दो सौ तक गन्ना खरीदने की शर्त रखते हुए मिल चलाने की बात कर रहे हैं। वे चीनी सस्ती होने का तर्क दे रहे हैं। पिछला भुगतान न मिलने से परेशान उत्तर  प्रदेश के किसानों ने पहले ही गन्ना कम बोया है और हतोत्साहित किसानों ने फसल पर अधिक ध्यान भी नहीं दिया। ऐसे में कम रकबा तथा हल्की फसल के कारण गत वर्ष के सापेक्ष उत्पादन काफी कम है। यदि मिल नहीं चले या देर से भी चले तो गन्ने की अधिकांश फसल कोल्हू और क्रेशरों पर खप जायेगी। जहां किसानों को भारी घाटा उठाने को मजबूर होना होगा। इससे किसान गन्ने से ही तौबा करने को मजबूर हो जायेगा।

मौजूदा हालात ऐसा होने की पुख्ता जानकारी दे रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। गेहूं की फसल बरबाद होने से किसान पहले ही परेशान था। मुआवजा राशि मिलने पर उसे थोड़ा राहत मिली थी तथा आत्महत्यायें बंद हुई थीं।

धान की फसल कट रही है। बाजार में धान का उचित मूल्य नहीं मिल रहा। सरकार ने पहले ही अच्छे धान की कीमत 14 सौ रुपये रखी है। यह बहुत कम है। पहले ही परेशान किसान लागत मुश्किल से बचा पायेगा। गन्ने का बकाया न मिलना पहले ही मुसीबत थी। अब रबी बुवाई के लिए तथा ठंड में गरम कपड़ों के लिए पैसा चाहिए। यह कहां से आयेगा? कहीं फिर परेशान किसान आत्महत्याओं का रास्ता न पकड़ने को मजबूर हो जाये?

दोनों सरकारें (केन्द्र और राज्य) किसानों की ओर ध्यान नहीं दे रही। किसानों को गन्ने का बकाया तुरंत मिले। धान का मूल्य दो हजार कम से कम मिले और गन्ना मिल नवंबर तक चलनी चाहिए। इससे रोजगार सृजन होगा। किसानों की जेब में जो पैसा पहुंचेगा। उसे वह तुरंत अपनी जरुरी चीजें खरीदने को बाजार में खर्च कर देगा। जहां से वह उद्योगों में जायेगा। यह हमारी अर्थव्यवस्था के ठप्प पहियों को भी गतिशील बनायेगा। जिस ढर्रे पर सरकारें चलने की कोशिश कर रही हैं उससे गांव, गरीब; शहर और उद्योग किसी का भी भला नहीं होगा।

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-जी.एस.चाहल.

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