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दीपावली की सार्थकता

दीपावली-की-सार्थकता

दीपावली हमारे देश में युगों-युगों से मनाया जाने वाला पर्व है। किसी न किसी रुप में यह संसार भर में मनाया जाता है। प्रकाश को ज्ञान तथा अंधकार को अज्ञान की संज्ञा दी जाती रही है। दीपावली हमें अज्ञान रुपी अंधकार से ज्ञान रुपी प्रकाश की ओर ले जाने का स्मरण कराती है। अमावस्या की काली रात को हम दीप प्रज्जवलित कर प्रकाशित करते हैं। विशाल भवनों से लेकर छोटी-छोटी झुग्गियों में इस पर्व पर प्रकाश दिखाई देता है। इस पवित्र त्योहार सभी त्योहारों की तरह हम एक-दूसरे को बधाईयां भी देते हैं।

आजादी के सात दशक हम पूरे करने जा रहे हैं। हम प्रतिवर्ष दीपावली को जोरशोर और हर्षोल्लास से मनाते आ रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ घरों में दीपावली का नशा बढ़ता जा रहा है। एक सात्विक तथा समतावादी त्योहार के मौकों पर ऐसे घरों में पटाखों और आतिशबाजी का इतना जखीरा इकट्ठा कर लिया जाता है कि वह रातभर चलाने के बाद भी समाप्त नहीं होता। गरीबों की जेब काट कर एकत्र किये धन से खरीदी महंगी और खतरनाक आतिशबाजी दूसरों की जगमगाती दिवाली को काली करने से भी बाज नहीं आती। इससे पूरा वातावरण बेहद प्रदूषित होता है। घुटन भरे, जहरीले धुएं में सांस तक लेना भी मुश्किल हो जाता है। इससे जहां स्वस्थ लोग भी बीमार होने का खतरा उठाने को मजबूर होते हैं वहीं दमे तथा सांस की बीमारियों का पहले ही सामना कर रहे लोगों की तो जान पर बन आती है।

खुशियों की बरसात का यह त्योहार घनी आबादी के शहरों में तो पूरी तरह दम घोंटू सिद्ध होता है। कई सामजसेवी संगठन खेतों के खरपतवारों को जलाने पर तो अदालतों से किसानों को दंडित कराने का आदेश कराने में सफल होते हैं, लेकिन वे दिवाली जैसे पवित्र त्योहार पर विस्फोटक सामग्री के प्रतिबंध का प्रयास नहीं करते। कान फोड़ू विस्फोटकों तथा अधिक धुंआ देने वाले पटाखों के निर्माण पर बिल्कुल प्रबंध होना चाहिए तथा दूसरे पटाखों का भी सीमित प्रयोग किया जाना जरुरी होना चाहिए। जिससे स्वच्छता तथा प्रकाश को समर्पित दीपावली खुशनुमा माहौल में सम्पन्न होकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।

-जी.एस. चाहल.

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