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किसानों की जमीन पर लगने वाले मेले में किसानों की जेब की लूट

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कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित गंगा स्नान मेले की तैयारियां जोरों पर हैं। यह मेला प्रतिवर्ष तिगरी तथा गढ़मुक्तेश्वर में गंगा नदी के दोनों तटों पर आमने-सामने लगता है। व्यस्त जिंदगी के कारण दशकों पूर्व पन्द्रह दिन तक तम्बुओं के नगर की शक्ल में लगने वाला यह मेला अब तीन-चार दिनों में ही सिमट कर रह जाता है।

किसानों की जमीन पर लगने वाले इस मेले में किसानों के बल पर ही हजारों दुकानदार अच्छी कमाई करके ले जाते हैं। नाना प्रकार के कर्मकांडों के बहाने भी उनकी जेब यहां खाली की जाती है। उन्हें टोल टैक्स तक देना पड़ता है।

तिगरी और उसे निकटवर्ती कई गांवों के किसानों की हजारों बीघा भूमि पर इस मेले का आयोजन करने के लिए वहां खड़ी फसल को पकने से पहले ही कटवा दिया जाता है। उसे प्रति फुट के हिसाब से दुकानदारों तथा दूसरे व्यावसाइयों को किराये पर दिया जाता है। जबकि भू-स्वामियों को फसल बरबादी के बावजूद कुछ भी नहीं दिया जाता।

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प्रतिवर्ष नये स्थान पर मेला लगता है। किसी निश्चित स्थान का एक बार नक्शा तैयार कर यदि हर बार वहीं मेला लगाया जाये तो किसान उसी हिसाब से पकने वाली फसल बोकर समय से खेत खाली कर सकता है, लेकिन गंगा की धार बदलने से ऐसा संभव नहीं। यदि मेला स्थल के करीब पक्के घाट बन जायें तो गंगा की धार निश्चित स्थान पर ही बहेगी। इससे स्नान करने में भी सुविधा रहेगी। गंगा स्नान स्थल का सौर्न्यीयकरण करने की मांग बार-बार उठती है लेकिन कितने शर्म की बात है कि सदियों से जारी एक धार्मिक परंपरा के लिए कोई भी सरकार घाट तक पक्के नहीं करा सकी। गंगा स्वच्छता में भी इससे सहायता मिलेगी।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.

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