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सरकारी नौकरों की जेब में जनता की कमाई

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सातवें वेतन आयोग ने केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को भत्तों और वेतन में 23.55 प्रतिशत की वृद्धि की सिफारिश की है। इससे 47 लाख केन्द्रीय कर्मचारी और 52 लाख पेंशन धारकों को लाभ होगा। यह सिफारिश अगले साल पहली जनवरी से लागू होने जा रही है। इसी में सेना के वन रेंक, वन पेंशन की मांग करने वाले सैनिक भी शामिल हैं।

यदि यह सिफारिश लागू होती है तो सरकारी खजाने पर एक लाख करोड़ रुपयों का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। आजाद भारत की सभी सरकारें सरकारी कर्मचारियों को गुलाम भारत की अंग्रेज सरकार की तरह खुश करती आ रही हैं। जिसके कारण देश के आम आदमी पर आयेदिन नये-नये टैक्स लादे जा रहे हैं और सरकारी कर्मचारी और अफसरों की वेतनवृद्धि कर उनकी सुख सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

यह न्यायोचित ही है कि सरकारी कर्मचारियों की सुख-सुविधाओं और वेतन तथा भत्तों को संतुलित किया जाये लेकिन सरकारी कामकाज में जबावदेही भी तय की जानी चाहिए और इसी के साथ भ्रष्टाचार और लापरवाही पर भी अंकुश लगना जरुरी है। केवल अधिकार ही नहीं बल्कि उससे पूर्व दायित्वों के निवर्हन पर फोकस जरुरी है। सभी जानते हैं कि आजकल पटवारी से लेकर विभाग के उच्चाधिकारी तक, थानेदार से लेकर एसपी तक तथा दूसरे विभागों में भी किस तरह भ्रष्टाचार के आरोप लगने की शिकायतें बढ़ रही हैं। शिक्षा विभाग, कृषि विभाग, बिजली विभाग, किसी विभाग को भी ले लें बुरा हाल है। समाज कल्याण विभाग की स्थिति से तो सभी वाकिफ होंगे। इंजीनियर से लेकर चिकित्सक तक सरकारी होते ही स्वेच्छाचारी हो जाते हैं।

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थोड़ा बहुत कुछ कह दो, सरकारी काम में बाधा डालने की रिपोर्ट दर्ज होने में तो देर ही नहीं। परेशान आम आदमी के न्यायिक बात करते ही चपरासी से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक एक मंच पर आ जाते हैं। वेतन आयोग ऐसे लोगों की हिमायत करता है और सरकार अपने कर्मचारियों की सेवा में तुरंत हाजिर होती है।

आम आदमी या ऐसे लोग जो पढ़े-लिखे होने के बावजूद एक दिन की सरकारी नौकरी भी नहीं पा सकते, सभी दलों की सरकारें उनसे वोट मांगने के बाद उनकी सुध नहीं लेतीं। लें भी क्यों उनके पास वोट थे वे मिल गये, अब तो सरकार, सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलेगी। इसलिए सरकारी कर्मचारियों पर जनता का पैसा लुटाना जरुरी है। इससे आम आदमी की जेब पर चाहें कितना ही बोझ पड़े।

-जी.एस. चाहल.

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