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उपेक्षा का शिकार गांव डगरौली डाकेवाली विकास में पीछे

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अशिक्षा, बेरोजगारी और अंधविश्वास के चंगुल में फंसा खादर क्षेत्र का गांव डगरौली डाकेवाली विकास की राह में जिले के दूसरे गांवों से काफी पीछे छूट गया है।

तहसील मुख्यालय से मात्र तीन किलोमीटर दूर रहरा रोड पर स्थित इस गांव की तीन हजार की आबादी में पचास दलितों को छोड़ शेष खड़गवंशी बिरादरी के लोग हैं।

गांव के लोगों का प्रमुख व्यवसाय, कृषि, पशुपालन तथा मजदूरी करना है। अधिकांश छोटे किसान हैं जिनके पास एक एकड़ से भी कम भूमि है। गांव में बिजली न होने के कारण डीजल इंजनों के सहारे सिंचाई की जाती है। जिसके भरोसे परिवार का पोषण नहीं हो सकता। अतः अधिकांश नवयुवक हसनपुर तथा दूसरे शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। जो लोग पशु पालन का काम करते थे, उन्होंने अपने अधिकांश पशु सपा शासन में चोरी की घटनायें बढ़ने के कारण बेच दिये।

गांव में एकमात्र प्राथमिक स्कूल है। जिससे पढ़ाई में कम ही लोगों में रुचि है। बड़ी आबादी निरक्षर है। चन्द युवक बाहर जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने में लगे हैं।

गांव में टूटा-फूटा, कीचड़ भरा खड़ंजा है जहां से होकर निकलना आसान नहीं। किसी भी प्रधान ने गांव के रास्ते या नाली बनवाने का प्रयास नहीं किया। जबकि प्रतिवर्ष कई मदों में विकास के लिए काफी धन आता है। गांव के साथ कालका वाली, मल्लवाली और बौनावाली नामक तीन मझरे भी जुड़े हैं। उनके छह लोग पढ़-लिखकर शिक्षक बन गये। बाकी लोग जस के तस हैं।

-हसनपुर से शिवकुमार की रिपोर्ट.

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