Header Ads

आपसी फूट है अन्नदाता की बदहाली का मूल कारण

सरदार-वीएम-सिंह-राकेश-टिकैत

किसान हितों के लिए लम्बे समय से संघर्ष कर रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह आगामी 30 दिसम्बर को किसानों के राजनीतिक दल की घोषणा करेंगे। वीएम सिंह राष्ट्रीय स्तर विशेषकर उत्तर भारत के किसानों के हितों की लड़ाई अदालतों के जरिये लड़ते आ रहे हैं। जिसमें वे कई बार किसानों के पक्ष में फैसले कराने में सफल रहे हैं। वैसे वे जगह-जगह सभायें करके किसानों को संगठित करते हुए उनके हकों के लिए संघर्ष को उत्साहित कर रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक वे संगठन या मुकदमे लड़ने के नाम पर कोई भी चन्दा या शुल्क नहीं लेते। उनकी सारी लड़ाई अपनी जेब तथा अपने स्वयं के बल पर ही चल रही है। ऐसे में वे चन्दा उगाही और बड़े-बड़े धरने देने वाले किसान संगठनों से अधिक काम करने में सफल रहे हैं। फिर भी उनका मानना है कि जबतक किसानों के पास राजनैतिक ताकत नहीं होगी तबतक उनके साथ न्याय नहीं होगा तथा किसान लगातार शोषण का शिकार होते रहेंगे।

भारतीय-किसान-यूनियन-के-राकेश-टिकैत
भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत को पिछले लोकसभा चुनावों में जनता ने नकार दिया था. उनके साथ चौधरी विजयपाल सिंह और हरि सिंह ढिल्लों जैसे लोग भी थे. 

सरदार वीएम सिंह चाहते हैं कि किसानों को विधानसभाओं और संसद में अच्छी तादाद में अपने बीच के लोग भेजने होंगे। जबतक किसानों के हाथ में सत्ता नहीं होगी तबतक वह इसी तरह उपेक्षित और उत्पीड़ित रहेगा। वे चौ. चरण सिंह के जन्म दिवस पर 23 दिसम्बर को दिल्ली में किसानों की सभा में एक नये राजनीतिक दल की घोषणा करेंगे। यह दल किसानों और मजदूरों के हकों की लड़ाई के लिए तैयार किया जायेगा। यह दल उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार मैदान में उतारेगा। वीएम सिंह ने गंगा स्नान मेले में अपनी एक सभा में कहा है कि किसानों को जाति बिरादरी दरकिनार करके केवल किसान बिरादरी मानकर अपने उम्मीदवारों के लिए वोट करना होगा। इसी तरह से किसानों को दशकों से धोखा देने वाले नेताओं को सत्ता से बेदखल कर सत्ता पर स्वयं कब्जा करना होगा।

सरदार वीएम सिंह समय-समय पर किसानों की सभाएं करते रहते हैं. 2010 में गजरौला में एक सभा के दौरान वीएम सिंह के साथ मंच पर कुछ किसान नेता मौजूद हैं.

स. वीएम सिंह जिस किसान एकता और किसानों की एकता की बात सोच रहे हैं, हकीकत में यह संभव नहीं है। किसी राज्य में कुछ भी हो लेकिन कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में यह बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है। यहां का किसान जाति-बिरादरी में बुरी तरह विभाजित है। यही हाल यहां के मजदूर वर्ग का भी है, यही कारण है कि आजतक यहां के किसान एक मंच पर नहीं आ सके। वे राजनीति के  दलालों के बहकाने में आ जाते हैं तथा बार-बार उन्हीं के द्वारा ठगे जाते हैं। उन्हें अपने पराये का या तो पता नहीं अथवा वे जानबूझकर जातीय बीमारी के शिकार हैं।

भारतीय किसान यूनियन, जिसके द्वारा किसानों के हितों की लम्बी लड़ाई का इतिहास है। राजनीति में प्रवेश करके ही किसानों में अलोकप्रिय हो गयी। राकेश टिकैत को उन किसानों ने ही वोट नहीं दिये जिनके लिए उनके पिता महेन्द्र सिंह टिकैत ने पूरा जीवन संघर्ष करते बिताया। साम्प्रदायिक धु्रवीकरण ने राकेश की जमानत तक जब्त करा दी।

भाकियू की तरह ही चौ. अजीत सिंह की रालोद को लोकसभा चुनाव में किसानों ने सिरे से ही नकार दिया। जबकि चौ. चरण सिंह और अजीत सिंह ने किसानों के लिए दूसरे नेताओं से अधिक काम किया था। साम्प्रदायिकता के सामने सारी उपलब्धियां पल भर में खत्म हो गयीं। हालांकि अब किसानों को समझ आने लगा।

किसानों के कई संगठन हैं. भाकियू जैसे संगठन के तो तीन टुकड़े हो चुके हैं.

स. वीएम सिंह ने किसानों के लिए जो लड़ाई चला रखी है या किसान हितों में उनकी जो भी उपलब्धियां हैं, वे तभी तक किसानों के लिए सर्वमान्य हैं जबतक सिंह साहब अराजनीतिक हैं। उनके राजनीति में कदम रखते ही ऐसे किसान जो उनके साथ बिना जातीय भेदभाव के साथ खड़े हैं, अपने-अपने सजातीय नेताओं के साथ खड़े दिखेंगे। साथ ही वीएम सिंह के विरोधियों की उन बातों पर भरोसा करेंगे, जो कहेंगे कि किसानों के वोट लेने के लिए किसान हितों की बात हो रही थी।

भले ही तब वीएम सिंह अपना सीना चीर कर दिखायें कि वे पूरी ईमानदारी से काम करेंगे। उनका इसमें कोई निजि स्वार्थ नहीं। वैसे भी उत्तर प्रदेश में वीएम सिंह के साथ किसानों की बहुत ही थोड़ी संख्या है। किसानों के कई संगठन होने से ऐसा है। भाकियू जैसे संगठन के ही तीन टुकड़े हो चुके। किसानों को एकजुट करने के बजाय तीनों गुटों के नेता आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ हैं। चौथा गुट वीएम सिंह का निकल आया। राजनीति करने वालों को किसानों की इस कमजोरी का पता है। यही कारण है कि आज किसानों की कहीं भी सुनवाई नहीं। स. वीएम सिंह को चाहिए कि वे पहले सारे किसानों को एक मंच पर लायें। यदि वे ऐसा करने में सफल हुए तो किसान हितों की लड़ाई आसानी से लड़ी जा सकती है। अभी राजनीतिक दल बनाने का उचित समय नहीं है।

जी.एस. चाहल के सभी लेख पढ़ें >>

-जी.एस. चाहल.

गजरौला-टाइम्स-फेसबुक-पेज