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उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की राह!

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महागठबंधन की बिहार में शानदार जीत के बाद विपक्षी दलों में पहले से ज्यादा जोश है। सबसे मजेदार बात है कि जोश कम नहीं हुआ है। बल्कि वक्त के साथ बढ़ता जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की तर्ज पर सपा और बसपा के साथ होने पर चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन लगता नहीं कि ऐसा हो पायेगा।

एक बात स्पष्ट जरुर हुई है पिछले कुछ दिनों में कि भारतीय जनता पार्टी को पराजित करने के लिए विपक्ष धीरे-धीरे अपनी तरफ से संभावनायें तलाशने में जुटा है। पुराने कड़वे अनुभवों को भुलाने की भी कोशिशें हो रही हैं। कुछ इसमें सफल हुए हैं, कुछ सफल होने के मूड में लग रहे हैं। जबकि कुछ ऐसे हैं जिनकी खटास शायद कभी कम न हो। उनके लिए 'एकला चलो’ ही बेहतर है। उसमें उनका खुद पर जरुरत से ज्यादा भरोसा भी जुड़ गया है।

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उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा में जितनी दूरी है, उससे अधिक दूरी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस तथा लेफ्ट के बीच है। बंगाल में कार्यकर्ताओं में मामूली झगड़े भी खूनी संघर्ष का रुप ले लेते हैं। वहां की राजनीति उत्तर प्रदेश से बहुत अलग है।

मगर दो दशक पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी में जो गेस्ट हाउस कांड हुआ था उसकी यादें मायावती के लिए हमेशा ताजा रहेंगी।

समाजवादी पार्टी की ओर से जो भी महागठबंधन के बयान सुनने में आ रहे हैं, उनपर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता।

पार्टी में कई सोच वाले लोग होते हैं जिनके बयान अहम हो सकते हैं। वैसे बयान बदलने में भी महारथ हासिल है हमारे नेताओं को।

-गजरौला टाइम्स.

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