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मांसाहार किस सभ्यता की निशानी?

मांसाहार-किस-सभ्यता-की-निशानी?

मानव सभ्यता 21वीं सदी का डेढ़ दशक खर्च कर चुकी। मानव समाज विकासशील से विकसित हो गया। संसार के सभी धर्म ईश्वर की सत्ता स्वीकार करते हैं तथा ईश्वर को सर्वशक्तिसम्पन्न और न्यायकारी मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि परमात्मा ने संसार में जो भी रचना की उनमें मानव सर्वोत्कृष्ट है। सभी जीवों में उसे बुद्धिमान और विवेकवान भी बनाया। इस मामले में वे यह भी मानते हैं कि परमेश्वर ने मानव को शक्ल सूरत में भी अपने जैसा ही बनाया। हालांकि इस मामले में थोड़ा बहुत मतभेद भी है जो कुछ तार्किक नहीं।

विवेक और शक्ति में विलक्षता प्रदान करने वाले प्रभु ने इंसान को कई दायित्व भी सौंपे होंगे। इस्लाम में यह जिक्र है कि ईश्वर ने मानव से कहा है कि मैंने तुझे संसार के सभी जीवों पर सरदार बनाया है। इसी से हमें यह भी समझना होगा कि मानव को जब संसार का मुखिया बनाया है तो संसार में मौजूद सभी पशु पक्षियों के सुख-दुख और हर तरह की जरुरतों का ध्यान भी मानव को ही रखना पड़ेगा। उसे इसके लिए भगवान ने पूरी तरह सक्षम तथा शक्तिशाली बनाया है। उसे विवेकशील बनाया है जिससे वह अपनी तथा दूसरों की संवेदना को महसूस करके सभी की संरक्षा, सुरक्षा, पालन-पोषण और दुख-दर्द को समझते हुए उनके प्रति दायित्व का निर्वह कर सके। ऐसे में प्राणियों की हत्या तो बहुत बड़ी बात है, उनका शोषण या प्रताड़ना का ईश्वर ने मनुष्य को अधिकार नहीं दिया। यह महापाप से भी बड़ा पाप है।

जब मानव जंगली था। उसका जीवन और रहन-सहन भी जंगली जानवरों जैसा था। वह भी असभ्य था, इसलिए ना समझी में जानवरों को मार कर खा जाता था। आज मानव सभ्य है। मानव सभ्यता शिखर पर है। ऐसे में इंसान का मांसभक्षी होना उसके सभ्य होने पर सवाल खड़ा करता है। जब लोग प्राचीन परंपराओं का हवाला देकर धर्म के नाम पर बेकसूर मूक और बेसहारा पशुओं का निर्दयतापूर्वक वध करते हैं तो यह और भी बड़ा अपराध और पाप है। ईश्वर ने मानव को शक्ति और विवेक बेकसूर, निरीह और मूक प्राणियों की सुरक्षा के लिए प्रदान किये हैं। उनका शोषण, उत्पीड़न और वध करने के लिए नहीं।

एकांत में बैठकर ध्याननिष्ठ होकर उस पशु की जगह स्वयं को रखकर मांसाहारी ईमानदारी से विचार कर वध के लिए बांधे पशु की मनोदशा के बारे में सोचें। वह बेचारा सोचता होगा कि मैंने किसी को कुछ नहीं कहा, फिर भी क्रूरता से मेरी हत्या की जा रही है। उसके भय, दुख तथा असहनीय पीड़ा की भला कोई सीमा है।

हम इंसान हैं और सभ्य इंसान हैं, यह और भी बड़ी बात है। यदि हम जानवरों को खा रहे हैं तो हम सभ्य कैसे हैं? बेकसूरों का खून बहाने वाला इंसान नहीं और सभ्य तो बिल्कुल भी नहीं। इंसान को तमाम जीवों का रखवाला बनाकर संसार के तमाम जीवों का दायित्व ऊपर वाले ने उसपर सौंपा है।

असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी के मंदिर में पशु बलि से पूजा होती थी। कई संगठनों और सभ्य समाज के दबाव से इस बार यह प्रथा बंद कर दी गयी। हमें गंभीरता से पशु हत्या पर विचार करना चाहिए। गाय, भैंस जैसे पशुओं की हत्यायें तो अविलंब रोकी जानी चाहिएं। इनका दूध, घी, दही, पनीर आदि हमारे लिए दुनिया के सर्वेश्रेष्ठ तथा स्वादिष्ट पदार्थ है। इनका गोबर हमारी फसलों तथा वनस्पति के लिए लाभदायक है। इतने बहुउपयोगी पदार्थ प्रदान करने वाले पशु मौत नहीं बल्कि हमारे प्यार, दुलार और सेवा के हकदार हैं। हमें इन्हें दुखी या इनके साथ क्रूरता नहीं बरतनी चाहिए।

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-जी.एस. चाहल.

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