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पंचायत चुनाव की दावतों के सामने गंगा मेले की रौनक पड़ी फीकी

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वैसे तो इस बार भी गंगा मेले में जाने वालों की अच्छी तादाद थी लेकिन ग्राम पंचायत चुनावों की चहल-पहल के कारण मेले की भीड़ पर असर पड़ा है। हर वर्ष आबादी बढ़ने के कारण मेले में भी लोगों की संख्या बढ़ जाती हैै। जिला पंचायत और प्रशासन की सतर्कता के कारण लोगों के सामने कोई बड़ी दिक्कतें नहीं रहीं और मेला शांतिपूर्ण चला। तम्बू गाड़ कर स्नान करने वालों के बजाय एक-दो बार मेला घूमकर घर लौटने वाले इस बार अधिक रहे। इसका मूल कारण भी पंचायत चुनाव ही हैं।

चुनावो-में-शराब-का-दौर-जारी-है

गंगा मेला भी मूलरुप से गांव खासकर किसानों का मेला माना जाता है। कई धार्मिक कर्मकांड और गंगा स्नान से पाप निवृत्ति वालों की जहां भीड़ रहती है वहीं पिकनिक मनाने वालों की संख्या उनसे भी अधिक रहती है। कुछ लोग दोनों मंतव्यों से मेला स्थल पहुंचते हैं।

निर्वाचन आयोग की चेतावनी और सख्ती के बावजूद ग्राम पंचायतों के चुनावों में शराब का प्रचलन तेजी पर है। कोई ऐसा गांव होगा जहां वोटरों को लुभाने या वोटरों के मांगने पर शराब न बांटी जा रही हो। हालत यहां तक पहुंच गयी है, शराब चुनाव जीतने की पहली शर्त है, शराब की क्वालिटी और मात्रा मतगणना का पैमाना बन चुकी है।

ग्राम-प्रधान-चुनाव-२०१५

बहुत से गांवों में तो शराब में सराबोर मतदाता दूसरे सभी काम छोड़ चुके। नवयुवकों खासकर किशोरों को इस लत में जबर्दस्ती घुसेड़ा जा रहा है। गंगा मेले को पिकनिक की तरह देखने वाले, बहुत से लोग बोतल में गंगा मेले की तस्वीर देखते हैं। उनका कहना है कि गांव में मुफ्त में पिकनिक से भी बड़ा आनन्द मिल रहा है तो मेले की धूल फांकने में कौनसी समझदारी है। इस तरह की मानसिकता वाले लोग उन सभी गांवों में मिल जायेंगे जहां चुनाव चल रहे हैं।

जिस पुलिस पर इस तरह की गतिविधियों पर पाबन्दी लगाने और गतिविधियों में शामिल लोगों पर कार्रवाई का दायित्व हैं, वे स्वयं उम्मीदवारों के हमदर्द बनकर उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं। किसी छापे और उच्च स्तरीय कार्रवाई से बचने के हथकंडे भी उम्मीदवारों को बता कर उन्हें सुरक्षित कर चुके हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि इन्हीं लोगों के सहारे वे ओवर इनका करते रहे हैं तथा चुनाव के दौरान उनपर राजनैतिक दबाव भी बनाया जाता है। ऐसे में वे भी सरल और लाभकारी रास्ते का चयन कर नौकरी की गाड़ी खींच रहे हैं। सबकुछ पता होने के बावजूद वे नादान और नासमझ बनकर अधिकारियों से सबकुछ छुपा जाते हैं। यही वजह है कि ग्राम पंचायतों में धुंआधार शराब का प्रचलन होने के बावजूद निर्वाचन आयोग की निगाह में सबकुछ ठीक चल रहा है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.

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