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तरक्की से दूर ग्राम पंचायतें

तरक्की-से-दूर-ग्राम-पंचायतें

ग्राम पंचायत चुनावों से पहले नये परिसीमन में कई नई ग्राम पंचायतें सृजित की गयी हैं इससे इन गांवों के लोगों को खुशी होगी कि वे भी अपना अलग से ग्राम प्रधान चुन सकेंगे। कुछ इस बात से खुश हुए होंगे कि उन्हें भी ग्राम प्रधान बनने का मौका मिलेगा।

खादर क्षेत्र में ग्राम पंचायत घासीपुरा, सुनपुरा खुर्द, सिकरी, सिहाली मेव और कर्मल्लीपुर ऐसी ही नवसृजित ग्राम पंचायतें हैं। नेशनल हाइवे के पार ग्राम शहवाजपुर डोर और मौम्मदाबाद ऐसी ग्राम पंचायतें हैं जहां कभी क्षेत्र पंचायत के प्रमुख भी बने थे मगर दोनों की विकास में स्थिति उतनी है कि लोग आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहाते हैं। उनकी मजदूरी इन गांवों की जेसीबी मशीनों के सुपुर्द हो चुकी है।

चुनाव की नजर से ग्राम मौम्मदाबाद में आजकल जिला पंचायत के लिए सदस्य निर्वाचित हुआ है और ब्लॉक प्रमुख बनने के प्रयास में हैं मगर तिगरी की ग्राम पंचायत की तरह उसे तो गंगा की रेती ही मिली है। तिगरी का तो रेत से भी पेट नहीं भरता अपितु प्रत्येक वर्ष कई लाख लोग कार्तिक पूर्णिमा पर आकर मेले का आनंद लेते हैं और छोड़ जाते हैं गंदगी से भरा गंगा तट जिसे हफ्तों कोई उठाने नहीं आता।

ब्लॉक गजरौला की अमरोहा सांसद की गोद ली ग्राम पंचायत चकनवाला को जाने के लिए गजरौला से जाने वाला लिंक मार्ग ही इतना उधड़ा पड़ा है कि उसकी कमर पर बदहाली को कोड़े बरसाये गये हों क्योंकि गोद लेने पर भी वह अपनी भाजपा पार्टी के प्रत्याशी को चुनाव में वोट नहीं देता।

ग्राम पंचायत कुमराला देखिये जो लंबे समय तक न्याय पंचायत का केन्द्र रहा मगर उसके बीच का मुख्य मार्ग आजतक सीसी रोड नहीं बन सका है। ग्राम पंचायत नगलिया मेव में तो जिला पंचायत सदस्य तक चुना गया लेकिन मेव समाज का इसमें एक भी घर नहीं है और आज प्रधानी के लिए अपने मजरे गंगापुरी की तरफ देखता रहता है। क्योंकि नगलिया मेव में भयंकर गुटबाजी रहती है। इसलिए विकास कौन कराये प्राथमिक विद्यालय की बाउंडरी का पैसा तक खाते में वर्षों से पड़ा है।

ग्राम पंचायत सुनपुरकलां वैसे कला गांव है मगर बच्चों के लिए जूनियर हाईस्कूल सरकारी नहीं लेकिन कई एक एकड़ ग्राम पंचायत की जमीन खाली पड़ी है।

ग्राम पंचायत शाहपुर उर्फ साहबपुर सिर्फ साहबपुर ही है। लोग मजबूरी में भूसा बेचने का धंधा करके पेट पालते हैं।

ग्राम पंचायत पखरौला का विकास के नाम पर कहीं रोल नहीं है। सत्तर गांवों से पलायन करके आये गांव शकूराबाद के लोग नशा करते हैं। वहीं मजदूरी के लिए दिल्ली तक घूमते हैं और गांव का प्रधान गांव में नहीं शहर में रहता है।

वहीं ग्राम पंचायत महेशरा ने सिर्फ तरक्की के नाम पर रेल ही देखी है। अहरौला तेजवन चरागाह की जमीन के लालच में गजरौला बनने से ही वंचित करा दी गयी थी नहीं तो आज नगरपालिका क्षेत्र में विकास करती मगर उसे प्रधान खचेड़ू सिंह काफी समय से खचेड़ते फिर रहे। फिर चुनाव जीत कर खचेड़ेंगे।

ग्राम पंचायत बांसली प्रदूषण में जिंदगी जी रही है। उसे तरक्की की जरुरत ही नहीं है। खादगूजर जो एक ईमानदार विधायक का गांव था आज विकास में ईमानदारी की चादर ताने सोया पड़ा है। ग्राम पंचायत नगला माफी जहां के ब्लॉक प्रमुख तक रहे आम रास्ते तक पर आंसू बहा रहा है क्योंकि उसके प्रधान सुखपाल ने उन्हें सुख नहीं दिया और ब्लॉक प्रमुख गजरौला से ही स्वर्ग सिधार गये।

जाट बाहुल्य ग्रामों की ग्राम पंचायतों को लिखना ही बेकार है क्योंकि यहां के लोग अपने बूढ़े माता-पिता को घरों की रखवाली पर छोड़कर नौकरी पर रहते हैं। ये वृद्धाश्रम ही हैं। खड़गवंशी गांवों की ग्राम पंचायतों के समूह सुल्तानठेर से लेकर विशावली तक आदम युग की जिंदगी जीने पर मजबूर है। जबकि जाटव समाज के लोगों की पंचायतें खाईखेड़ा खादर आदि में बहनजी की जय-जयकार करना ही तरक्की का पैमाना है।

-हाजी सलाम (गजरौला)

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