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मिट्टी से दस्तकारी करने वाले हो रहे बेरोजगार

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जिले के अधिकांश गांवों में मिट्टी के बर्तन और दूसरी गृहउपयोगी वस्तुओं की कला के निर्माता कई नई समस्याओं के चलते अपना पुश्तैनी कारोबार बन्द करते जा रहे हैं। कई परिवार दूसरे कार्यों में दखल के साथ प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं जबकि आर्थिक मजबूरी या शिक्षा के अभाव के चलते नये काम में हाथ डालने से घबराने वाले कुछ परिवार अभावग्रस्त जीवन जीते हुए इस कला से चिपके हैं।

सरदूल और उनका परिवार पुश्तैनी बर्तन बनाने का काम करता आ रहा है। वे कहते हैं,'पेशा नहीं प्यार है यह। दुनिया बदल रही है, कुम्हारी भी सिमट रही है। आगे जाकर कौन करना चाहेगा कुम्हारी?’ सरदूल जैसे कितने कुम्हारी करने वाले लोग मिटी की बनावट से अद्भुत चीजों को गढ़ना बंद कर रहे हैं।

कुम्हारी कला को मजबूती प्रदान करने को जिला उद्योग केन्द्रों में कई सरकारी योजनायें हैं लेकिन जानकारी के अभाव और ऐसे केन्द्रों के संचालकों और कर्मचारियों की उपेक्षा के चलते ऐसी योजनायें फाइलों में बंद पड़ी हैं। पूरे जिले में भूल से किसी कुम्हार को ऐसी योजना का कोई लाभ मिला हो तो कहा नहीं जा सकता। यही कारण है कि यह कला दम तोड़ने के कगार पर जा पहुंची है।

उल्लेखनीय है कि किसी जमाने में शादी विवाहों में सभी गांवों के हर वर्ग में मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन जोरों पर था। कई अन्य समारोहों में भी कुल्हड़ों का प्रयोग होता था। दो दशक पूर्व तक चाय की दुकानों पर कुल्हड़ों में चाय पीने वालों की भारी तादाद थी। दुकानों पर गरम दूध पीने के शौकीन मिट्टी के बड़े कुल्हड़ों में ही पीते थे।

बीते ढाई दशक में लोगों के बदले खान-पान और रहन सहन के ढंग ने जहां मिटी के बर्तनों को तेजी से प्रचलन से बाहर किया, वहीं प्लास्टिक के हल्के और सस्ते बर्तनों ने उनका स्थान तेजी के साथ लेना शुरु कर दिया जबकि उनमें चाय आदि पीना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

दूसरी ओर तालाबों में चिकनी मिट्टी का अभाव एक बड़ी समस्या बन गया। लोगों ने तालाबों को समाप्त करना शुरु कर दिया। नये खनन कानूनों और पर्यावरण के लिहाज तथा जल संचयन के लिए जिन तालाबों का जीर्णोद्धार किया गया वहां चिकनी मिट्टी भी नहीं थी। यदि होती भी तब भी उसको खोदना गैरकानूनी हो चुका है।

देखा जाये तो कुम्हारी कला पर सबसे बड़ा बज्रपात मिट्टी उपलब्ध न होने से पड़ा है। लोग प्राकृतिक फ्रिज,'घड़े’ और 'मटकों’ के लिए तरस गये। बल्कि ये चीजें भूलते जा रहे हैं। घर-घर उपयोग होने वाले ये बर्तन कहीं-कहीं नजर आते हैं।

दो-चार गांवों के चन्द लोग इस कला को जीवित रखे हैं जो घड़े और कुल्हड़ आदि का निर्माण कर रहे हैं उनका कहना है कि सबसे बड़ी समस्या चिकनी मिट्टी की है। इसको उपलब्ध करना टेढी खीर होता जा रहा है। गजरौला, फत्तेहपुर, कुंआखेड़ा, कुम्हारपुरा और भानपुर ऐसे गांव थे जहां के बने मिट्टी के बर्तन दूर-दूर तक मशहूर थे तथा सभी बाजारों में उपलब्ध रहते थे। लेकिन उपरोक्त दिक्कतों के चलते यहां भी इस व्यवसाय से जुड़े दो-चार परिवार ही बचे हैं।

-अमरोहा से हरमिंदर सिंह.

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